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करुणानिधि: कभी लिखा करते थे फिल्मों की स्क्रिप्ट, आज दक्षिण की राजनीति के हीरो हैं

Karunanidhi

नई दिल्ली: तमिलनाडु ही नहीं बल्‍कि देश की सियासत के कद्दावर नेता मुत्तुवेल करुणानिधि ऊर्फ एम.करुणानिधि दक्षिण भारत की राजनीति में अपना एक अलग प्रभाव और दबदबा रखते हैं. 94 वर्षीय इस बेहद वरिष्‍ठ राजनेता की राजनीति में पहुंचने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. वे पहले फिल्‍म पटकथा, लेखक थे और फिल्‍मी पर्दे पर दर्शाई गई उनकी इन्‍हीं कहानियों ने उनके लिए राजनीति का रास्‍ता तैयार किया.

तय किया पटकथा से लेकर राजेनता तक का सफर :

करुणानिधि ने तमिल फिल्म उद्योग में एक पटकथा लेखक के रूप में करियर शुरू किया, लेकिन जल्‍द ही व्‍यवहारिक समझ, कुशल वक्तृत्व कला के बूते वे राजनेता बन गए. करुणानिधि ईवी रामास्‍वामी पेरियार के द्रविड़ आंदोलन से जुड़े थे और उस आंदोलन के प्रचार में उन्‍होंने अहम भूमिका अदा की. दरअसल वे सामाजिक बदलाव को बढ़ावा देने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक कथाएं लिखने के लिए लोकप्रिय रहे थे और अपनी इसी कहानी कथन प्रतिभा का इस्‍तेमाल उन्‍होंने तमिल सिनेमा में किया और एक फिल्म ‘पराशक्ति’ के जरिये राजनीतिक विचारों का प्रचार करना शुरू किया.

1969 में पहली बार बने सीएम
1969 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने के बाद करुणानिधि का राजनीतिक जीवन कई उतार-चढ़ावों से गुजरा है. 1967 के बाद से तमिलनाडु की राजनीति एआईएडीएमके और डीएमके के बीच विभाजित रही है और कांग्रेस पार्टी पूरी तरह हाशिए पर जिन्दा है.

1977 में जब दिल्ली में जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ, तब एआईएडीएमके पार्टी कांग्रेस के साथ और डीएमके जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन में थीं. तब डीएमके को केवल एक सीट और एआईएडीएमके को 19 सीटें मिली थीं. गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन के साथ ही करुणानिधि का दिल्ली की राजनीति में प्रवेश हुआ. वे तमिलनाडु में कांग्रेस-विरोध के ध्रुव के रूप में उभरे.

करुणानिधि ने की तीन शादियां

करुणानिधि ने तीन बार शादियां की. उनकी तीनों पत्‍नी पद्मावती, दयालु आम्माल और राजात्तीयम्माल. उनके बच्‍चे एम.के. मुत्तु, एम.के. अलागिरी, एम.के. स्टालिन और एम.के. तामिलरसु जबकि पुत्रियां सेल्वी और कानिमोझी रहीं. पद्मावती, जिनका देहावसान काफी जल्दी हो गया था, ने उनके सबसे बड़े पुत्र एम.के. मुत्तु को जन्म दिया था. अज़गिरी, स्टालिन, सेल्वी और तामिलरासु दयालुअम्मल की संताने हैं, जबकि कनिमोझी उनकी तीसरी पत्नी राजात्तीयम्माल की पुत्री हैं.

वीपी सिंह को पीएम बनाने में अहम योगदान 
1989 को लोकसभा चुनाव के नतीजों में डीएमके पार्टी को एक भी सीट पर विजय ‍नहीं मिल पाई थी, लेकिन करुणानिधि ने वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाने में चौधरी देवीलाल के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. संसदीय दल की बैठक में देवीलाल को नेता चुना गया था, लेकिन देवीलाल ने नेता चुने जाने के बाद प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार करके वीपी सिंह को नेता बनाने का प्रस्ताव पेश कर दिया था, जिसका करुणानिधि ने समर्थन किया था.

यूपीए सरकार में करुणानिधि की खास भूमिका 

फिर कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी द्वारा देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद इंद्रकुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनने में भी करुणानिधि ने निर्णायक भूमिका निभाई. इसी दौरान कांग्रेस के नेताओं के साथ उनके रिश्ते बने.

यूपीए और एनडीए दोनों में शामिल
1998 में एआईएडीएमके के समर्थन वापस लेने से अटल बिहारी वाजेपयी की सरकार गिर गई. फिर 1999 के लोकसभा में डीएमके एनडीए का हिस्सा बन गई. 2004 के लोकसभा चुनाव के पहले ही डीएमके ने एनडीए का साथ छोड दिया. करुणानिधि यूपीए के संस्थापक सदस्यों में एक हैं.

फिर मनमोहन सिंह सरकार में करुणानिधि का दबदबा इतना अधिक था कि वे ही तय करते थे कि उनकी पार्टी से जुड़े मंत्रियों को कौन-से विभाग मिलने चाहिए. मनमोहन सिंह चाहते हुए भी दयानिधि मारन को संचार मंत्रालय से नहीं हटा पाए.

बाद में जब 2जी में भ्रष्टाचार को लेकर विवाद इतना गंभीर हो गया कि डा. मनमोहन सिंह को डीएमके के मंत्री ए. राजा व करुणिानिधि की बेटी कनिमोझी को जेल भिजवाना पड़ा. ऐसी स्थिति में करुणानिधि के सामने कांग्रेस पार्टी से अपना रिश्ता खत्म करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. करुणानिधि आज उम्र के इस पड़ाव पर राजनीतिक अकेलेपन का सामना कर रहे हैं.

नहीं है भारतीय राजनीति में ऐसा नेता 

करुणानिधि जैसा नेता पूरे भारतीय राजनीति में बेहद अलग है. उनके नाम एक ऐसा रिकॉर्ड है, जो किसी के पास नहीं है.  दरअसल करुणानिधि ने अपने 60 साल के राजनीतिक कॅरियर में अपनी भागीदारी वाले हर चुनाव में अपनी सीट जीतने का रिकॉर्ड बनाया है, ऐसा नेता पूरे भारत में कोई नहीं है. वे पांच बार (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011) मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

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