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टीपू जयंती पर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने,जानें- क्या है विवाद

21_10_2017-tipu
कर्नाटक में एक बार फिर टीपू जयंती को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। भाजपा का कहना है कि महज अल्पसंख्यक वोटों के लिए कांग्रेस ये सब कर रही है।

 भारतीय इतिहास में कई ऐसे शासक हुए, जिनका जिक्र होते ही विवादों की पूरी सीरीज सामने आने लगती है। सल्तनत युग में जहां मुहम्मद बिन तुगलक को विवादों के सुल्तान के रूप में जाना जाता था, वहीं मुगल काल में औरंगजेब के करीब सभी फैसले विवादों के साए में रहे। आधुनिक युग आते-आते भारत के भाग्य विधाता का चेहरा बदल चुका था। अठारहवीं सदी के अंत तक भारत के ज्यादातर हिस्सों को अंग्रेज अपने कब्जे में कर चुके थे। उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक यूनियन जैक लहरा रहा था, हालांकि कुछ राजवंशों, नवाबों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उनमें से एक थे मैसूर के शासक टीपू सुल्तान। टीपू सुल्तान का एक पक्ष है कि वो बहादुर थे। लेकिन दूसरा पक्ष ये भी है कि वो अपने राज्य में हिंदुओं और ईसाईयों को लेकर असहिष्णु थे।

टीपू जयंती और विवाद
कर्नाटक में टीपू सुल्तान की जयंती को लेकर विवाद बढ़ गया है। सिद्धरमैया सरकार 10 नवंबर को टीपू सुल्तान की जयंती मनाने के लिए कार्यक्रम करना चाहती है, जिसका भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध किया जा रहा है। भाजपा का आरोप है कि यह काम अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए कर रही है। ऐसे में भाजपा नेता और केंद्रीय कौशल विकास राज्य मंत्री अनंत कुमार हेगड़े का एक खत भी सामने आया है। यह खत उन्होंने सिद्धारमैया के सचिव को लिखा है, जिसमें कहा गया है कि टीपू सुल्तान से संबंधित किसी कार्यक्रम में उनको न बुलाया जाए। हेगड़े इससे पहले 2016 में भी मैसूर के राजा रहे टीपू सुल्तान का जन्मदिवस मनाने का विरोध कर चुके हैं।

पत्र में लिखा गया है कि टीपू सुल्तान अत्याचारी था और उसने हजारों हिंदुओं का कत्ल और कोडागू के लोगों पर अत्याचार किया था। इसके उलट कांग्रेस का दावा है कि टीपू सुल्तान स्वतंत्रता सेनानी थे और यह काम अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए नहीं किया जा रहा। मामले के बढ़ने पर सिद्धारमैया ने कहा था कि कार्यक्रम का न्योता राज्य और केंद्र सरकार के सभी नेताओं को भेजा जाएगा, जिसको स्वीकार और नकार देना उनकी मर्जी है। सिद्धरमैया ने टीपू के पक्ष में कहा कि ब्रिटिश शासकों के खिलाफ मैसूर राज्य ने चार युद्ध लड़े और उन चारों में टीपू ने हिस्सा लिया था।

 मालाबार मैनुअल और टीपू सुल्तान
– 19वीं सदी में ब्रिटिश गवर्मेंट के अधिकारी और लेखक विलियम लोगान ने अपनी किताब ‘मालाबार मैनुअल’ में लिखा है कि कैसे टीपू सुल्तान ने अपने 30,000 सैनिकों के दल के साथ कालीकट में तबाही मचाई थी। टीपू सुल्तान हाथी पर सवार था और उसके पीछे उसकी विशाल सेना चल रही थी। पुरुषों और महिलाओं को सरेआम फांसी दी गई। उनके बच्चों को उन्हीं के गले में बांधकर लटकाया गया।

– विलियम यह भी लिखते हैं कि शहर के मंदिर और चर्चों को तोड़ने के आदेश दिए गए। यही नहीं, हिंदू और ईसाई महिलाओं की शादी जबरन मुस्लिम युवकों से कराई गई। पुरुषों से मुस्लिम धर्म अपनाने को कहा गया और जिसने भी इससे इंकार किया, उसे मार डालने का आदेश दिया गया।

– कई जगहों पर उस पत्र का भी जिक्र मिलता है, जिसे टीपू सुल्तान ने सईद अब्दुल दुलाई और अपने एक अधिकारी जमान खान के नाम लिखा है। टीपू सुल्तान लिखते हैं- ‘पैगंबर मोहम्मद और अल्लाह के करम से कालीकट के सभी हिंदूओं को मुसलमान बना दिया है। केवल कोचिन स्टेट के सीमवर्ती इलाकों के कुछ लोगों का धर्म परिवर्तन अभी नहीं कराया जा सका है। मैं जल्द ही इसमें भी कामयाबी हासिल कर लूंगा।

– 1964 में प्रकाशित किताब ‘लाइफ ऑफ टीपू सुल्तान’ का जिक्र भी जरूरी है। किताब में लिखा गया है कि उसने मालाबार क्षेत्र में एक लाख से ज्यादा हिंदुओं और 70,000 से ज्यादा ईसाइयों को मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया।

– किताब के मुताबिक धर्म परिवर्तन टीपू सुल्तान का असली मकसद था, इसलिए उसने इसे बढ़ावा दिया। जिन लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया, उन्हें मजबूरी में अपने बच्चों को शिक्षा भी इस्लाम के अनुसार देनी पड़ी। इनमें से कई लोगों को बाद में टीपू सुल्तान की सेना में शामिल किया गया और अच्छे ओहदे दिए गए।

– टीपू सुल्तान के ऐसे पत्रों का भी जिक्र मिलता है, जिसमें उसने फ्रेंच शासकों के साथ मिलकर अंग्रेजों को भगाने और फिर उनके साथ भारत के बंटवारे की बात की। ऐसा भी जिक्र मिलता है कि उसने तब अफगान शासक जमान शाह को भारत पर चढ़ाई करने का निमंत्रण दिया, ताकि यहां इस्लाम को और बढ़ावा मिल सके।

टीपू सुल्तान से जुड़ी खास बातें

– टीपू सुल्तान का पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब  था। ये नाम उनके पिता हैदर अली ने रखा था।

– टीपू सुल्तान बादशाह बनकर पूरे देश पर राज करना चाहता था, लेकिन उसकी ये इच्छा पूरी नही हुई। 18 वर्ष की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध जीता था।

– 15 साल की उम्र से टीपू ने अपने पिता के साथ जंग में हिस्सा लेने की शुरुआत कर दी थी। हैदर अली ने अपने बेटे टीपू को बहुत मजबूत बनाया और उसे हर तरह की शिक्षा दी। इस वजह से टीपू सुल्तान को शेर-ए-मैसूर कहा गया।

– टीपू अपने आसपास की चीजों का इस्लामीकरण चाहता था। उसने बहुत सी जगहों का नाम बदलकर मुस्लिम नामों पर रखा। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद सभी जगहों के नाम फिर से पुराने रख दिए गए।

– गद्दी पर बैठते ही टीपू ने मैसूर को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया। उसने लाखों हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें मुसलमान बना दिया। लेकिन टीपू की मृत्यु के बाद वे दोबारा हिंदू बन गए।

– टीपू सुल्तान की तलवार पर रत्नजड़ित बाघ बना हुआ था। बताया जाता है कि टीपू की मौत के बाद ये तलवार उसके शव के पास पड़ी मिली थी।

– टीपू सुल्तान की तलवार का वजन 7 किलो 400 ग्राम है। वर्तमान समय में टीपू की तलवार की कीमत 21 करोड़ रुपये है।

– दुनिया के पहले रॉकेट अविष्कारक टीपू सुल्तान थे। ये रॉकेट आज भी लंदन के एक म्यूजियम में रखे हुए हैं। अंग्रेज इन्हें अपने साथ ले गए थे।

– टीपू ‘राम’ नाम की अंगूठी पहनते थे, उनकी मृत्यु के बाद ये अंगूठी अंग्रेजों ने उतार ली थी और फिर इसे अपने साथ ले गए।

– सन् 1799 में अंग्रेजों के खिलाफ चौथे युद्ध में मैसूर की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान की मौत हो गई।

– टीपू सुल्तान के12 बच्चों में से सिर्फ दो बच्चों के बारे में पता चल पाया है, जबकि 10 बच्चों की जानकारी आज भी किसी के पास नहीं हैं।

जानकार की राय 

दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्नविद्यालय गोरखपुर से पीएचडी डॉ संजय कुमार मिश्र ने टीपू जयंती पर विस्तार से बातचीत की। उन्होंने कहा कि इसमें संदेह नहीं कि टीपू ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। लेकिन एक सच ये भी है कि वो अपनी हिंदू प्रजा के प्रति असहिष्णु था। टीपू को ये लगता था कि कई हिंदू सामंत और छोटे मोटे राजा अंग्रेजों की मदद किया करते थे, लिहाजा वो हिंदुओं के प्रति नफरत का भाव रखता था। इसके अलावा ईसाईयों के प्रति टीपू की नफरत अंग्रेजों की वजह से थी। टीपू सुल्तान ने भले ही अपनी सेना को संगठित करने के साथ बड़े पैमाने पर यूरोपीयकरण किया हो। लेकिन उसके अंदर मैसूर के वाडियार वंश के प्रति भी नफरत का भाव भरा हुआ था।

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