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बिहार की एक हाइप्रोफाइल शादी जो दे रही है सार्थक संदेश

05_12_2017-lalu_sumo1
बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बेटे उत्कर्ष का एक साधारण आयोजन में परिणय सूत्र में बंधना समाज को कई संदेश देने वाला है

नई दिल्ली [ डॉ. मोनिका शर्मा] । हाल ही में बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बेटे उत्कर्ष की शादी धूम-धाम और शाही खर्च के दिखावे से दूर सादगी भरे ढंग से संपन्न हुई। यही वजह है कि यह शादी कई सार्थक संदेश दे गई। किफायती शादी का यह आयोजन एक बेहतरीन उदाहरण बन गया जो चर्चित परिवारों से लेकर आमजन तक सभी के लिए अनुकरणीय है। बिना बैंड-बाजा और भोज के आयोजित उपमुख्यमंत्री के बेटे की इस शादी में शामिल करीब 150 लोगों ने अंगदान का संकल्प भी लिया। इसमें देहदान-अंगदान और दहेज रहित शादी के संकल्प के लिए बाकायदा अलग से एक काउंटर भी बनाया गया था। इतना नहीं कोई ऐसा तामझाम नहीं था जो दिखावे और अन्न-धन की बर्बादी को बढ़ावा दे। शादी में पर्यावरण सहेजने का सुंदर संदेश भी दिया गया। कार्ड छपवाने के बजाय मेहमानों को शादी में ई-निमंत्रण कार्ड से आमंत्रित किया गया। अतिथियों को शादी के मौके पर प्रसाद स्वरूप चार-चार लड्डू दिए गए। लड्डू के पैकेट में ‘स्वच्छ भारत’ और ‘खाली बोतल व डिब्बा डस्टबीन में डालें’ का संदेश भी लिखा था। विवाह समारोह रात के बजाय दिन में आयोजित किया गया ताकि दिन की शादियों को प्रोत्साहन मिले और सजावट के साथ ही और भी कई तरह के खर्चो से बचा जा सके। वैदिक रीति-रिवाज के मुताबिक संपन्न हुई इस शादी में लोगों को उपहार लाने की भी मनाही थी।

अनुकरणीय समारोह का आयोजन
यह समारोह एक अनुकरणीय आयोजन है, क्योंकि राजनीति, फिल्म और व्यवसाय जैसे लगभग सभी क्षेत्रों से जुड़े चर्चित चेहरों के साथ ही आम परिवारों में भी वैवाहिक समारोहों में बेवजह के खर्चे करना हमारे यहां आम बात है। बीते कुछ बरसों में भारत में शादियों में होने वाले बेतहाशा और गैर-जरूरी खर्चो को हद दर्जे का बढ़ावा मिला है। खासकर समाज के जाने-माने परिवारों में तो वैवाहिक समारोहों में पानी तरह की तरह पैसा बहाया जाता है। हमारे यहां शादियों की फिजूलखर्ची को सामाजिक और आर्थिक रुतबे से इस कदर जोड़ दिया गया है कि किफायती समारोह आयोजित करने का विचार ही लोगों को कमतरी का अहसास करवाता है। जाने कैसा सामाजिक मनोवैज्ञानिक दबाव है, जो समय के साथ इस मानसिकता को कम करने के बजाय और बढ़ावा ही दे रहा है।

शादी के जरिए समाज को संदेश
एक समय था जब शादी समारोह समाज को जोड़ने वाले परंपरागत आयोजन भर हुआ करते थे। हालिया बरसों में तो लोग विवाह समारोह के परंपरागत रूप से बिल्कुल कट गए हैं। रीति-रिवाज और आपसी मेलजोल का भाव भी नाम मात्र का रह गया है। दिखावे की चकाचौंध में आपसी स्नेह और सामाजिक-पारिवारिक सहयोग की वह सोच भी गुम हो गई जो शादियों में देखने को मिलती थी। ऐसे में बिहार जैसे राज्य में संपन्न हुई यह सहज-सरल सी शादी अर्थपूर्ण संदेश तो देती ही है वैवाहिक समारोह को रीत-रिवाज से जोड़ने वाली भी है। ध्यान देने वाली बात है कि इस शादी में उपस्थित मेहमानों को न केवल विवाह संस्कार के संस्कृत मंत्रों के हिंदी अनुवाद की एक-एक पुस्तिका भेंट स्वरूप दी गई, बल्कि मेहमानों को वैवाहिक संस्कारों जैसे मसलन गणपति पूजन, कलश पूजन, द्वार पूजन, वरमाला, सप्त वचन, सिंदूरपूर्ति, मंगल फेरे आदि को देखने जानने का मौका भी मिला। सही मायने में देखें तो विवाह समारोह में आने वाले मेहमानों की यही सहभागिता भरी उपस्थिति मायने रखती है। जो दिखावे और चकाचौंध से भरे आयोजनों से कहीं बेहतर है।

गौरतलब है कि बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी कानून के बाद बाल विवाह और बिना दहेज की शादी के लिए लोगों को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। ऐसे में उपमुख्यमंत्री के बेटे की शादी में दहेज लेने की मनाही और सादगीपूर्ण आयोजन बदलाव की और बढ़ते समाज की बानगी है। उपमुख्यमंत्री का कहना है कि बिहार सरकार ने दहेज और बाल विवाह के खिलाफ जो मुहिम छेड़ी है। हम सब इसके साथ हैं और सबों को इस मुहिम में साथ देना चाहिए। आमतौर पर देखने में आता है कि हमारे नेतागण कई तरह के बदलाव की बात तो करते हैं, पर खुद उसमें भागीदार नहीं बनते। अधिकतर जनप्रतिनिधियों के घर में होने वाले वैवाहिक समारोहों में पैसे पानी की तरह बहाए जाते हैं। ऐसे समारोह आमजन को भी मुंह चिढ़ाते से ही लगते हैं। भव्यता भरी ऐसी शादियां हर बार चर्चा का विषय बनती हैं। कई सवाल भी उठाए जाते हैं, क्योंकि जिस देश में आम जनता जरूरत के सामान के लिए समझौता कर रही हो, वहां ऐसे दिखावे की कोई जरूरत ही नहीं। बावजूद इसके हमारे यहां महंगी शादियां करने का शौक चरम पर है। ऐसे दिखावे भरे भव्य समारोहों का एक पहलू यह भी है कि ये पूरे समाज के मनोविज्ञान पर नकारात्मक असर डालते हैं। ऐसे में राजनीति की दुनिया से जुड़े एक परिवार में बहुत साधारण तरीके से आयोजित यह समारोह सराहनीय तो है ही।

दिखावे भरी शादियों को बाय बाय
गौर करने वाली बात यह है कि विकास के आंकड़ों से परे देश में आज भी सामाजिक स्तर और मानसिकता में बड़ा बदलाव नहीं आया है। इतना ही नहीं समय-समय पर ऐसे आंकड़े भी सामने आते रहते हैं जो भारतीय समाज में मौजूद आर्थिक विषमता को सामने रखते हैं। आर्थिक संवर्धन के आंकड़ों में अव्वल हमारे देश में आज भी बुनियादी स्तर पर समानता के हालात नहीं हैं। वैवाहिक समारोहों में खाने की बर्बादी को लेकर आए खाद्य मंत्रलय के अध्ययन के मुताबिक शादी जैसे समारोह में बनने वाले खाने का 20 फीसद हिस्सा तो बर्बाद ही हो जाता है। यही वजह है कि आम नागरिकों को ऐसे आयोजन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गैरबराबरी और हीनता का अहसास करवाते हैं।

विचारणीय है कि दिखावे भरी शादियां जहां समाज में गलत संदेश देते हुए धन-दौलत की अभद्र नुमाइश का जरिया बनती हैं वहीं ऐसे सादगीपूर्ण आयोजन आमजन को भी हौसला देने वाले हैं। बहरहाल देश के हर वर्ग में जिस कदर शादी-ब्याह महंगे होते जा रहे हैं और दहेज-दिखावे का चलन बढ़ रहा है, एक चर्चित परिवार के बेटे का यूं साधारण आयोजन में परिणय सूत्र में बंधना कई संदेश देने वाला है।
(लेखिका सामाजिक विषयों की जानकार हैं)

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