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अजब गजब! भारत से हजारों मील दूर ‘सीताराम’ बोलकर करते हैं लोग अभिवादन

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लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने भारत से हजारों मील दूर त्रिनिदाद में जिस भारतीय संस्कृंति की झलक देखी उसे देख वह आश्चभर्यचकित रह गईं।

नई दिल्ली। त्रिनिडाड के एक संग्रहालय के अधिकारी शेषभान जोखन बोले,’ सुना है गोरक्षनाथ पीठ के महंत उत्तर प्रदेश के गर्वनर बन गए हैं। उनकी ही बोली में, ‘हम सुने मांगे हैं कि जौन गोरक्षनाथ टेंपल रहे, वाके स्वामी जी यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तरप्रदेश का पुराना नाम) के हेड बन गए हैं। यू नो ही वाज विजि़टिंग त्रिनिडाड वेन पीएम मोडी आस्कड हिम टू बिकम गवर्नर!! मैं उनकी जानकारी दुरुस्त करती हूं, गवर्नर नहीं, चीफ मिनिस्टर ! और यूनाइटेड प्रोविंस अब उत्तरप्रदेश है। जोखन खुश जाते हैं। उनके पूर्वज भी गोरखपुर से ही त्रिनिडाड पहुंचे थे। जिस देश में आठ बरस की बालिका से लेकर अस्सी वर्ष के वृद्ध भी “सीताराम” बोलकर अभिवादन करते हों, जहां घर घर में सोहर, गारी, बिरहा के सुर आज भी गूंजते हों, जहाँ की संस्कृति के आधारपुरुष हों श्री राम! ऐसी प्रणम्य भूमि त्रिनिडाड आना मेरे लिए पुण्य धाम यात्रा थी। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय एवं त्रिनिडाड स्थित भारतीय हाई कमीशन ने मुझे लोकसंगीत प्रस्तुति के लिए बुलावा भेजा।

चौबीस घंटे की हवाई यात्रा और तीन महाद्वीप पार करके मैं त्रिनिडाड पहुंची और रास्ते भर यही सोचती रही कि एक सौ सत्तर वर्ष पूर्व कोलकाता से गयाना तक का सफर कितने महीनों में और कितना कष्ट उठा कर तय हुआ होगा! कैरेबियन द्वीपों में सबसे पहले गिरमिटिया भाई 1838 में कोलकाता से चलकर जमैका पहुंचे थे। 30 मई 1845 को फतेह रजाक नाम का जहाज गिरमिटिया श्रमिकों को लेकर त्रिनिडाड के नेल्सन द्वीप पहुंचा था। फिर यह सिलसिला चलता ही रहा। अधिकतर गिरमिटिया उत्तरप्रदेश के थे। वे बताते हैं कि उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना है कि अठारह सौ सत्तावन की लड़ाई से भयभीत हुई ब्रिटिश सरकार ने अवध के बागियों को जबरन जहाज में भरकर त्रिनिडाड भिजवा दिया था।

1857 और 1858 में भारतीय युवाओं से भरे हुए जहाजों की खेप त्रिनिडाड पहुंचने के पर्याप्त प्रमाणों से इस धारणा को बल भी मिलता है। प्राचीन अभिलेखों को जब मैंने स्वयं देखा तो पाया कि अधिकांश लोग लखनऊ, लखीमपुर, बहराइच फैजाबाद, गोंडा, जौनपुर, प्रतापगढ़ बाराबंकी और गोरखपुर के रहने वाले थे और अधिकतर गिरमिटिया भाइयों की उम्र अठारह से तीस वर्ष थी। उस समय भारत पराधीन था तो यूरोपीय देशों ने धन के बदले काम का प्रस्ताव दिया और एग्रीमेंट पर दस्तखत कराया। एग्रीमेंट को “गिरमिट” कहनेवाले हमारे सरल पुरखे इसीलिए “गिरमिटिया” कहलाये। वे पराधीन थे और पराधीन ही हो कर हजारों मील दूर अंजान देश जा पहुँचे लेकिन अंग्रेजों के अत्याचार का सामना करते हुए उन्होंने अपने कठोर श्रम द्वारा जंगल और दलदल को उपजाऊ भूमि में बदल दिया।

न उन्हें भोजन पर्याप्त मिलता और न जीने का मौलिक अधिकार! ऐसे में उनकी प्राणशक्ति बनी राम में उनकी आस्था, स्मृति में बसी चरितमानस और हनुमान चालीसा। आधे पेट रहकर अंग्रेजों के कोड़े खाते हुए भारतीयों के लिए हनुमान जी का बल और राम का संघर्ष संजीवनी बन गया। त्रिनिडाड में आज भी घर-घर हनुमान चालीसा और सुंदर काण्ड का पाठ होता है। सभी भारतीयों के घर में तुलसी का चौरा और घर के ऊपर फहराती लाल ध्वजा भारतीय संस्कृति की सगर्व घोषणा करती प्रतीत होती है। पराई धरती पर सनातन धर्म और संस्कृति को बचाने के इनके संघर्ष को शिवदास साधु की जीवन गाथा से समझा जा सकता है। शिवदास साधु को यह बात विचलित करती कि भारतीयों को शव जलाने तक का अधिकार नहीं था। उन्होंने अंग्रेज सरकार से भारतीय परिवारों के अंतिम संस्कार हेतु अलग से छोटा भूखंड मांगा पर जो मना कर दिया गया। बार-बार मांग अस्वीकार होने के बाद शिव दास साधु ने घोषणा की कि समुद्र पर तो किसी का स्वामित्व नहीं।

अत: वे समुद्र पाटकर भूमि जुटाएंगे। अंग्रेजों की प्रताडऩा और प्रकृति का कोप सहकर भी शिवदास समुद्र में मिट्टी भरने का प्रयास करते रहे। उनके साहस और समर्पण ने सम्पूर्ण गिरमिटिया समाज को एकजुट कर दिया और अंतत: समंदर को भी समर्पण करना पड़ा। सागर किनारे बना श्वेत मंदिर, साधु की मूर्ति और पार्श्व में चिताओं से उठता धुआं भारतीय संस्कृति की आभा से प्रदीप्त दीपशिखा है। त्रिनिडाड में लगभग चालीस प्रतिशत हिन्दू मतावलंबी हैं। हजारों मील की दूरी, विदेशी भूमि, विदेशी भाषा, खान-पान, पहनावा, विश्वास, संस्कृति भी उनकी भारतीयता को मिटा न सकी। वासुदेव पांडेय और कमला बसेसर त्रिनिदाद में भारतीय मूल के प्रधानमंत्री रहे। वी एस नायपाल जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार इसी परंपरा के वाहक हैं।

सनातन धर्म मंदिर में अस्सी फीट ऊंची हनुमान जी की मूर्ति को देख जब मैंने शीश झुकाया तो मंदिर के मुख्य पुजारी बोले, हम अब अपने पुर्वजों की भाषा नहीं जानते। लेकिन अंग्रेजी और स्पेनिश में हनुमान जी पर आपको किसी भी हिन्दुस्तानी से बेहतर बता सकते हैं। उनकी बात सच निकली। अपने चार कार्यक्रमों के दौरान जैसी भीड़ से मेरा साक्षात्कार हुआ और जिस मनोयोग से उन्होंने पूर्वजों की धरोहर से जुडऩे का प्रयास किया, वह देख मन आदर से भर उठा। आज त्रिनिडाड में भारत से पहुंचे पूर्वजों की पांचवीं, छठी पीढ़ी है। उन्हें गर्व है कि उनका मूलाधार भारत है। भारतीय देवी देवता, पूजा आराधना, पर्व-उत्सव, खान-पान, गीत-संगीत उनके जीवन को सम्पूर्ण बनाते हैं। त्रिनिडाड में दीपावली एक माह तक मनाई जाती है। उत्सव स्थल का नाम ही दिवालीनगर पड़ गया है।
त्रिनिदाद में एक नगर फैजाबाद भी मिलेगा और बैरकपुर भी। दाल भात, कढ़ी, बैंगन जिसे बड़े प्यार से वे भाटा कहते हैं, पीला कोहड़ा, भाजी, फुलौरी तीखी चटनी उनका भोजन है। रोटी का स्थान ‘बशप” ने ले लिया है। बशप एक बड़ी सी परतदार रोटी के छोटे छोटे टुकड़े होते हैं। इसका चलन कैसे आया इसकी भी भावनात्मक कहानी है। भारत से जहाज में आते हुए स्त्रियों को सबके लिए भोजन बनाना पड़ता। सैकड़ों आदमियों के लिए जितनी भी रोटियां बनाई जाएं कम पड़तीं। आखिरकार कई लोइयों को एक साथ बेलकर एक बड़ी परतदार रोटी बनने लगी
जिसके छोटे छोटे टुकड़े सब आपस में बांट लेते। ‘बशप आज भी एक मुड़े तुड़े टुकड़े जैसा दिखता है।

त्रिनिडाड वासियों को दु:ख है कि वे अपनी भाषा नही बचा सके किन्तु वे अपनी संतानों को पूर्वजों की धरती से जोड़े रखना चाहते हैं। भारतीय हाई कमिश्नर डा. विश्वदीप डे ने बताया कि इस वर्ष तीन सौ लोगों को हिंदी, संस्कृत, कला-संगीत और बनारस में धर्म संस्कृति पूजा पद्धति, कर्मकांड, ज्योतिष अध्ययन हेतु भेजा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी पचीस वर्ष पूर्व त्रिनिडाड में लगभग एक माह रहे हैं, यह बात वहां आम जानकारी में है। अपने कार्यक्रम में जैसे ही मैंने बिटिया के जन्म का सोहर सुनाया, और प्रधानमंत्री जी की योजना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का ज़िक्र भर किया, उनके नाम की जयजयकार होते देखना गौरवान्वित कर गया। त्रिनिडाड से हमारा रक्त संबंध है, सांस्कृतिक और भावनात्मक सम्बंध है और इसलिए उन्हें भारत से बहुत अपेक्षाएं हैं। धन्य है भारतीय संस्कृति की अमरबेल जो जहां भी प्रसरित हुई, आज भी पल्लवित है, पुष्पित है। धन्य है त्रिनिदाद में बसे हमारे गिरमिटिया पूर्वज! नमन उनके संघर्ष को, नमन उनके साहस को!

[मालिनी अवस्थी]

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