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40 घटों की लड़ाई के बाद आज के ही दिन हुआ था भारत में गोवा का विलय

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19 दिसंबर देश के इतिहास में उस तारीख के रूप में दर्ज है जब भारतीय सेना ने गोवा, दमन और दीव में प्रवेश करके इन इलाकों को साढ़े 400 साल के पुर्तगाली आधिपत्य से आजाद कराया था।

नई दिल्ली – 19 दिसंबर देश के इतिहास में उस तारीख के रूप में दर्ज है जब भारतीय सेना ने गोवा, दमन और दीव में प्रवेश करके इन इलाकों को साढ़े चार सौ साल के पुर्तगाली आधिपत्य से आजाद कराया था। देश की आजादी के बाद गोवा को भारत में विलय करवाने के लिए भारत ने बड़ी सैन्य कार्रवाई की थी, जिसका नतीजा आज हमारे सामने है। 30 मई 1987 को गोवा को राज्‍य का दर्जा दे दिया गया जबकि दमन और दीव केंद्रशासित प्रदेश बने रहे। ‘गोवा मुक्ति दिवस’ प्रति वर्ष ’19 दिसंबर’ को मनाया जाता है। आपको जानकर हैरत होगी कि पुर्तगाल के राष्‍ट्रपति प्रधानमंत्री एंटोनियो कोस्टा का ताल्‍लुक भारत के इसी गोवा से है। कोस्टा गोवा मूल के एक कवि ओर्लान्दो के बेटे हैं। औपनिवेशिक सामंतवादी व्यवस्था पर ओर्लान्दो की किताब ‘ओ सिंग्नो दा इरा’ आज भी गोवा की क्लासिक साहित्यक कृतियों में गिनी जाती है। कोस्‍टा को लिस्बन का गांधी भी कहा कहा जाता है। आज भी गोवा की मार्गाओ रुआ अबादे फरिया रोड पर उनकी बहन अन्ना केरिना रहती हैं और उनका पुराना घर मौजूद है।

भारत आने वाले पहले और छोड़ने वाले यूरोपीय शासक

आपको बता दें कि पुर्तगाली भारत आने वाले पहले (1510) और यहां उपनिवेश छोड़ने वाले आखिरी (1961) यूरोपीय शासक थे। गोवा में उनका 451 साल तक शासन रहा जो अंग्रेजों से काफी अलग था। पुर्तगाल ने गोवा को ‘वाइस किंगडम’ का दर्जा दिया था और यहां के नागरिकों को ठीक वैसे ही अधिकार हासिल थे जैसे पुर्तगाल में वहां के निवासियों को मिलते हैं। उच्च तबके के हिंदू और ईसाइयों के साथ-साथ दूसरे धनी वर्ग के लोगों को कुछ विशेषाधिकार भी थे। जो लोग संपत्ति कर देते थे उन्हें 19वीं शताब्दी के मध्य में यह अधिकार भी मिल गया था कि वे पुर्तगाली संसद में गोवा का प्रतिनिधि चुनने के लिए मत डाल सकें।

हर लिहाज से गोवा बेहद अहम

भारत के लिए गोवा बेहद अहम था। अपने छोटे आकार के बावजूद यह बड़ा ट्रेड सेंटर था और मर्चेंट्स, ट्रेडर्स को आकर्षत करता था। प्राइम लोकेशन की वजह थे गोवा की तरफ मौर्य, सातवाहन और भोज राजवंश भी आकर्षत हुए थे। गौरतलब है कि 1350 ई. पू में गोवा बाहमानी सल्तनत के अधीन चला गया लेकिन 1370 में विजयनगर सम्राज्य ने इसपर फिर से शासन जमा लिया। विजयनगर साम्राज्य ने एक सदी तक इसपर तब तक आधिपत्य जमाए रखा जब तक कि 1469 में बाहमानी सल्तनत फिर से इसपर कब्जा नहीं जमा लिया।

ऐंक्लेव्स पर कब्जा 

1954 में, निशस्त्र भारतीयों ने गुजरात और महाराष्ट्र के बीच स्थित दादर और नागर हवेली के ऐंक्लेव्स पर कब्जा कर लिया। पुर्तगाल ने इसकी शिकायत हेग में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में की। 1960 में फैसला आया कि कब्जे वाले क्षेत्र पर पुर्तगाल का अधिकार है। कोर्ट ने साथ में ये भी फैसला दिया कि भारत के पास अपने क्षेत्र में पुर्तगाली पहुंच वाले ऐंक्लेव्स पर उसके दखल को न मानने का पूरा अधिकार भी है।

पुर्तगाल की मौजूदगी को बर्दाश्त नहीं 

बार-बार बातचीत की पेशकश ठुकराने के बाद 1 सितंबर 1955 को, गोवा में भारतीय कॉन्सुलेट को बंद कर दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि सरकार गोवा में पुर्तगाल की मौजूदगी को बर्दाश्त नहीं करेगी। भारत ने पुर्तगाल को बाहर करने के लिए गोवा, दमान और दीव के बीच में ब्लॉकेड कर दिया। इसी बीच, पुर्तगाल ने इस मामले को अंतराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की पूरी कोशिश की। लेकिन, क्योंकि यथास्थिति बरकरार रखी गई थी, 18 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना ने गोवा, दमन और दीव पर चढ़ाई कर ली। इसे ऑपरेशन विजय का नाम दिया गया। पुर्तगाली सेना को यह आदेश दिया गया कि या तो वह दुश्मन को शिकस्त दे या फिर मौत को गले लगाए। भारतीय सैनिकों की टुकड़ी ने गोवा के बॉर्डर में प्रवेश किया। 36 घंटे से भी ज्यादा वक्त तक जमीनी, समुद्री और हवाई हमले हुए। लेकिन भारत ने अंततः पुर्तगाल के अधीन रहे इस क्षेत्र को अपनी सीमा में मिला लिया। पुर्तगाल के गवर्नर जनरल वसालो इ सिल्वा ने भारतीय सेना प्रमुख पीएन थापर के सामने सरेंडर किया।

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