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ट्रंप के तीखे तेवर से पाक में खलबली, भारत को मिल सकता है फायदा

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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि अब पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़नी ही होगी।

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उम्मीदवार रहे डोनाल्ड ट्रंप कहा करते थे कि आतंकवाद को पालने-पोषने वाले देशों के खिलाफ वो सख्य रुख अपनाएंगे। ट्रंप के सरकार में आने के बाद लोगों में ये उम्मीद जगी कि भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान के खिलाफ वो कार्रवाई करेंगे लेकिन उन्होंने जो फैसले लिए उनमें दबाव और मनुहार दोनों था। लेकिन कनाडाई-अमेरिकी जोड़ी बोएल की रिहाई को लेकर पहली बार ट्रंप प्रशासन खुलकर पाकिस्तान को चेतावनी दी कि वो हक्कानी नेटवर्क की गिरफ्त ले उनके नागरिकों की रिहाई सुनिश्चित करे।अमेरिकी सरकार की चेतावनी का असर भी दिखा। लेकिन उसके बाद से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच कड़वे बोल अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। अमेरिका ने 25 करोड़ 50 लाख डॉलर की मदद पर रोक लगाने का ऐलान किया है लेकिन लेकिन सवाल ये है कि क्या अमेरिका सिर्फ मदद और चेतावनी का खेल खेलता रहेगा या जमीनी तौर वो पाकिस्तान के खिलाफ पुख्ता कार्रवाई करेगा।

एक जनवरी 2018 को पूरी दुनिया नए साल का जश्न मना रही थी। लेकिन पाकिस्तान के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का एक ट्वीट किसी सदमें से कम नहीं था। ट्रंप ने कहा कि पिछले 15 वर्षों में पाकिस्तान ने अमेरिका को मुर्ख बनाया है। अमेरिका ने मदद के नाम पर पाकिस्तान को 33 बिलियन डॉलर मुहैया कराए लेकिन सच ये है कि अफगानिस्तान में जिन आतंकी संगठनों के खिलाफ हम कार्रवाई करते हैं उन्हें पाकिस्तान अपने यहां सुरक्षित ठिकाना मुहैया कराता है। पाकिस्तान के हुक्मरान अमेरिकी नेताओं को मुर्ख समझते हैं।

एक तरफ ट्रंप ने ट्वीट किया तो उसके कुछ देर बाद ही पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने ट्वीट के जरिए ही जवाब दिया। उन्होंने कहा कि इंशाअल्ला हम पूरी दुनिया तथ्यों और कल्पना का सच बताएंगे।

ट्रंप के ट्वीट से पाकिस्तान इस कदर नाराज हुआ कि उसने अमेरिकी राजदूत को विदेश मंत्रालय में तलब किया और अमेरिकी राष्ट्रपति के ट्वीट पर विरोध दर्ज कराया। यहां पर यह जानना जरूरी है कि आखिर ट्रंप ने पाकिस्तान के खिलाफ इतनी सख्त भाषा का इस्तेमाल क्योंकिया। दरअसल इंटर-सर्विसेज पब्लिक सर्विसेज के मुखिया मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा कि अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान जरूरत से ज्यादा मदद कर चुका है। अब अमेरिका और अफगानिस्तान को आगे बढ़कर और काम करने की आवश्यकता है। यहां ये बताना जरूरी है कि हाल ही में अमेरिका और अफगानिस्तान दोनों सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि पाकिस्तान में कुछ सुरक्षित पनाहगाह हैं जहां अफगानिस्तान से आने वाले आतंकियों को शरण मिलती है।

ISPR मुखिया के ना’पाक’ राग

आइएसपीआर के मुखिया ने अमेरिका से गुजारिश की थी कि वो भारत पर दबाव बनार अफगानिस्तान में उसकी भूमिका पर लगाम लगाए। यही नहीं भारत की तरफ से बढ़ती सीजफायर उल्लंघन पर भी रोक लगाने को कहे।जानकारों का कहना है कि वाशिंगटन की तरफ से एकतरफा कार्रवाई की संभावना के बीच पहली बार इस्लामाबाद की तरफ से इस तरह की कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज करायी गई।

जानकार की राय

दैनिक जागरण से खास बातचीत में प्रोफेसर हर्ष वी पंत ने कहा कि ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान की नीयत पर अमेरिका को कभी संदेह न रहा हो। ओबामा प्रशासन की तरफ से इस तरह के सवाल उठाए गए और पाकिस्तान पर दबाव बनाने की कोशिश की गई। लेकिन ट्रंप प्रशासन खुलकर पाकिस्तान के खिलाफ स्टैंड ले रहा है। हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ अभियान के नाम पर पाकिस्तान ने अमेरिका का दोहन किया। लेकिन कनाडाई-अमेरिकी जोड़ी को बंधक बनाने के मामले में पाकिस्तान की पोल खुल गई। ट्रंप प्रशासन इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अब पाकिस्तान के साथ कड़ा रवैया अपनाना होगा। ट्रंप के हालिया ट्वीट से भी इस बात की पुष्टि होती है।

जब अमेरिका के खिलाफ खोलकर बोले आसिफ
पाकिस्तान के एक प्राइवेट चैनल को दिए साक्षात्कार में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि हम अमेरिका से साफ कह चुके हैं कि अब और नहीं, और इसका अर्थ साफ है कि ट्रंप के बयान का हमारे लिए कोई मतलब नहीं है। हम सार्वजनिक तौर पर अमेरिकी मदद को सार्वजनिक करने के लिए तैयार हैं। ख्वाजा आसिफ ने कहा कि हकीकत ये है कि अफगानिस्तान में मिल रही नाकामी से ट्रंप निराश हैं और हताशा में वो पाकिस्तान को निशाना बना रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका को सलाह दी कि तालिबान के खिलाफ ताकत इस्तेमाल करने की जगह बातचीत का रास्ता अख्तियार करना चाहिए।

पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ जहां एक तरफ अमेरिका को खुली चुनौती देते हैं, वहीं रक्षा मंत्री खुर्रम दस्तगीर का दर्द उनके ट्वीट में झलकता है। वो कहते हैं कि आतंकनिरोधी सहयोगी के तौर पर पाकिस्तान ने तालिबान के खिलाफ कार्रवाई में अमेरिका को जमीन, वायु मार्ग, संचार सुविधा, सैन्य बेस और सबकुछ उपलब्ध कराया। लेकिन बदले में अमेरिका ने पाकिस्तान को कुछ भी नहीं दिया। अमेरिका ने पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करने के साथ भद्दा मजाक किया है।


ख्वाजा आसिफ कहते हैं कि अमेरकी जिस मदद की बात करते हैं उनमें वो फंड भी शामिल है जिसके जरिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तानी सुविधाओं को वो इस्तेमाल करते हैं। वो पाकिस्तान की सड़क, रेल और दूसरी सेवाओं का फायदा उठाते हैं जिसका वो भुगतान करते हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिकी मदद का पूरा लेखाजोखा है। ख्वाजा आसिफ ने कहा कि ट्रंप को उन लोगों को जिम्मेदार बताना चाहिए जो अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में नाकाम रहे।

ट्रंप के इस कड़े रुख से क्या भारत को फायदा होगा। इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर हर्ष वी पंत ने कहा कि अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की मदद को इनकार नहीं किया जा सकता है। अमेरिका उसके एवज में आर्थिक मदद देता रहा है। लेकिन जहां तक भारत का सवाल है उसे कुछ हद तक कामयाबी मिलेगी। दरअसल पाकिस्तान को अब अमेरिका को समझाना होगा कि वो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरा मानदंड नहीं रखते हैं। क्या अमेरिकी दबाव की वजह से पाकिस्तान पूरी तरह चीन के साथ खड़ा होगा। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारत को रोकने के लिए चीन, पाकिस्तान की मदद तो करेगा, लेकिन वो किसी बोझ को उठाने की जहमत भी नहीं उठाएगा।

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