नई‍ दिल्ली-दुर्लभ काले हिरण की हत्या के मामले में फिल्म अभिनेता सलमान खान को दोषी पाते हुए बीते पांच अप्रैल को जोधपुर की एक अदालत ने पांच साल की कैद की सजा सुनाई, परंतु दो दिन बाद ही अभिनेता को ऊपरी अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया। हालांकि कानून में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं, पर क्या हर सजायाफ्ता व्यक्ति ऊपरी न्यायालय के समक्ष जाकर इस प्रकार जमानत प्राप्त कर पाता है? सजा पाए व्यक्तियों के मामलों में न्यायालय सामान्यत: भारतीय अपराध प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 389 के अंतर्गत निहित शक्ति का प्रयोग कर किसी सजा पाए व्यक्ति को जमानत पर रिहा करते हैं, पर यह पूर्णत: न्यायालय के विवेक पर निर्भर है कि वह सजा पाए व्यक्ति को रिहा करे या नहीं। खिलारी बनाम उत्तर प्रदेश (2009) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ऐसे में विवेक का प्रयोग न्यायिक हो और अपीलीय न्यायालय को जमानत देने के कारण स्पष्ट बताने चाहिए।

मनु शर्मा बनाम दिल्ली राज्य (2010) और अन्य कई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि ऐसे मामलों में जमानत देते समय न्यायालय को ख्याल रखना चाहिए कि या तो प्रथम दृष्टया सजा के कारण पर ठोस संदेह उजागर हुआ है या फिर मामले में अपील के निस्तारण में अनुचित देरी की संभावना हो। इन्हीं कारणों के मौजूद होने पर जमानत देनी चाहिए। इस प्रावधान के पीछे मुख्य उद्देश्य है कि कोई भी निदरेष व्यक्ति, जिसको गलती से सजा हो गई है, को अपील निर्धारण में अनुचित देरी की वजह से अकारण जेल में बंद न रहना पड़े। देश में जेलें आरोपित तथा सजा पाए लोगों से भरी पड़ी हैं, पर बेहद कम व्यक्तियों को इस प्रकार जमानत की सुविधा मिल पाती है। भारत में जमानत संबंधी मुख्य कानून भारतीय आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 है, जिसके कई प्रावधान न्यायालय को जमानत देने का अधिकार देते हैं। मुख्यत धारा 436, 437, 438 व 439 में निचली व ऊपरी अदालतों को विभिन्न अपराधों में जमानत देने का अधिकार प्राप्त है।

इस संहिता में अपराधों को संज्ञेय और असंज्ञेय अपराध तथा जमानती व गैर जमानती अपराधों में वर्गीकृत किया गया है। यद्यपि अपराध परिभाषित किसी और कानून में होते हैं जैसे भारतीय दंड संहिता या फिर किसी और कानून जैसे वन्य जीव (संरक्षण) कानून 1972, जिसमें सलमान खान के द्वारा किए कार्य को अपराध घोषित किया गया है, परंतु किसी भी अपराध की गंभीरता तथा उसकेलिए प्रदत्त सजा ही निर्धारित करती है कि उक्त अपराध ऊपर वर्णित किस वर्ग में शामिल होगा। यही बात आमतौर पर जमानत का मापदंड भी तय करती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में कहा है कि चाहे कितने भी गुनहगार छूट जाएं, पर किसी निदरेष को कभी सजा नहीं होनी चाहिए।

किसी भी व्यक्ति को जब तक बेहद जरूरी न हो जेल में नहीं भेजना चाहिए, क्योंकि एक आम तथा निर्दोष व्यक्ति जेल के माहौल को आसानी से सहन नहीं कर सकता। इससे उसके समस्त व्यक्तित्व पर बुरा प्रभाव पड़ता है। और वह उसके बाद कभी भी पहले जैसा नहीं रह सकता। इससे उसकी नौकरी छूट सकती है। उसके परिवार को, जो उस पर निर्भर होता है, काफी मुश्किलों और तकलीफों का सामना करना पड़ता है। समाज में उसकी छवि भी खराब होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार बनाम कैप्टन जगजीत सिंह (1962), गुरचरण सिंह बनाम दिल्ली शासन (1978), दिल्ली शासन बनाम संजय गांधी (1978), गुरबक्श सिंह बनाम पंजाब (1980), संजय चंद्रा बनाम सीबीआइ (2012) और अनेक अन्य मामलों में जमानत संबंधी अनेक सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं, जिनका निचली समस्त अदालतों को पालन करना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने निचली अदालतों को निर्देश दिया है कि गैर जमानती अपराधों में जमानत देते समय उन्हें अपराध की गंभीरता, साक्ष्यों की प्रकृति, अपराधी से जुड़ी परिस्थितियां, वाद के समय अपराधी की न्यायालय में अनुपस्थिति की संभावना, साक्ष्यों से छेड़छाड़ तथा गवाहों को हानि की आशंका, लोकहित तथा ऐसी अन्य बातों को संज्ञान में रखना चाहिए, परंतु निचली अदालतों के निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का अनुसरण कम ही देखने को मिलता है और ज्यादातर जमानत के मामले उनके विवेकाधिकार पर निर्भर करते हैं। क्या यह हमारे न्यायिक व्यवस्था की कमी को नहीं दर्शाता कि न्यायालयों के पास ऐसा कोई वस्तुनिष्ठ तरीका नहीं है जिससे ऐसे मामलों में विरोधाभासी फैसले न आएं और सारे देश में एक जैसे मामलों में एक जैसे निर्णय हों, जो व्यक्ति के सामाजिक या आर्थिक स्तर पर निर्भर न होकर समानता पर आधारित हों।

न्याय पाने का अधिकार मात्र अमीर तथा प्रभावशाली व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रह सकता, न ही एक आम आदमी को इस अधिकार से वंचित किया जा सकता है। आज भी देश में असंख्य लोग बेवजह ही कानूनी समस्याओं में फंस जाते हैं। फिर वे और उनका परिवार अनेक प्रकार के शोषण का शिकार बनते हैं। तब भी उनको सरल, सस्ता व त्वरित न्याय प्राप्त नहीं हो पाता। हमारी न्यायिक व्यवस्था ब्रिटिश न्यायिक व्यवस्था पर आधारित है जिसे विरोधात्मक मुकदमेबाजी कहते हैं जिसमें दो पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगते हैं तथा एक निष्पक्ष व तटस्थ न्यायाधीश उनके मामलों को सुनता व सुलझाता है। ऐसे में वह एक व्यक्ति के पक्ष में फैसला देता है, जो कि निश्चय ही दूसरे के विरोध में जाता है।

ऐसी व्यवस्था में सामान्यत: दोनों ही पक्ष असंतुष्ट रह जाते हैं। एक हार जाने के कारण तथा दूसरा न्याय देर से मिलने के कारण। इस व्यवस्था में अन्य खामियां भी हैं जैसे कि न्याय प्रक्रिया का महंगा होना, न्यायाधीशों की निष्पक्षता तथा निरंतर अनिश्चिता के चलते दोनों पक्षों में फैसले को लेकर चिंता का बना रहना। इस परिस्थिति के चलते जनता का न्याय व्यवस्था में विश्वास पैदा होना मुश्किल होता है। आज जरूरत ऐसी समानांतर वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करने की है जिसमें न्यायिक संस्था की सकारात्मक भूमिका हो, जो कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर अपने प्रति विश्वास पैदा कर सके। हमारी सरकार को ऐसी न्यायिक व्यवस्था बनाने का प्रयास करना चाहिए जिसमें अनिश्चितता तथा विरोधाभास न हो।