चंडीगढ़- हरियाणा के चार जिलों में किसानों के लिए बने एग्रो मॉल से अब सरकार पैसा कमाने की तैयारी में है। पिछली हुड्डा सरकार के कार्यकाल में करीब 200 करोड़ रुपये से ये मॉल तैयार हुए थे, लिहाजा इतनी बड़ी रकम की भरपाई सरकार की प्राथमिकता बन गई है। ऐसे में सरकार इनको बेचना चाहती है,लेकिन उसे ग्राहक नहीं मिल रहे।

हरियाणा में किसानों के उत्पादों की खरीद और बिक्री के लिए बनाए गए एग्रो माल कामयाब नहीं हो पाए हैं। रोहतक, करनाल, पानीपत और पंचकूला के चारों एग्रो माल सफेद हाथी बनकर रह गए। इन एग्रो माल की दुकानें काफी महंगी हैं, जिन्हें कोई न तो किराये पर लेने को तैयार है और न ही खरीदने का साहस कर पा रहा है। एग्रो माल में किसान उत्पादों की बिक्री इसलिए भी संभव नहीं हो पाई, क्योंकि उनमें लाभ का प्रतिशत काफी कम रहता है। लिहाजा अब चारों माल बंद जैसे हैं।

नगर निगम, बिजली कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हालांकि इन एग्रो माल में अपने दफ्तर खोलना चाहते हैं और इसके लिए लगातार हरियाणा सरकार से संपर्क बनाए हुए हैं, लेकिन सरकार उन्हें वाजिब किराये के बिना एग्रो माल के भवन सौंपने को तैयार नहीं है। मौजूदा भाजपा सरकार अब इन एग्रो माल को सामान्य माल में तबदील करने के बारे में सोच रही है। पंचकूला, करनाल, पानीपत और रोहतक के एग्रो माल बनाने की शुरुआत पिछली हुड्डा सरकार के कार्यकाल 2008 में हुई थी।

सभी एग्रो माल का निर्माण कार्य 2013-14 में पूरा हो गया। अब भाजपा सरकार के कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ को सभी माल अव्यावहारिक लग रहे हैं। हुड्डा के गृह नगर रोहतक में बने एग्रो माल की लागत 95 करोड़ रुपये है। पंचकूला के माल पर 60 करोड़ और पानीपत के माल पर 25 करोड़ की लागत आई है। करनाल में भी माल पर 20 से 30 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।

हुड्डा सरकार ने माल बनाते हुए निर्णय लिया था कि इन माल के भूतल पर कृषि उत्पाद और कृषि उपकरणों की बिक्री होगी, जबकि ऊपरी मंजिलों पर मल्टीप्लेक्स का निर्माण किया जाएगा। मगर ऐसा हो नहीं पाया और साढ़े तीन साल में कृषि विभाग के उच्च अधिकारियों ने अपनी स्टडी में इन एग्रो माल को फेल पाया है। कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ विधानसभा में दो बार कह चुके कि इन एग्रो माल का कांसेप्ट ही सही नहीं था।

ऐसे में इन चारों मॉल को सरकार बेचना चाहती है। रियल एस्टेट के कारोबार में मंदी की वजह से सरकार को अभी इन मॉल की वाजिब कीमत नहीं मिल रही। इसलिए जब तक रियल एस्टेट की मार्केट उछाल नहीं लेती, राज्‍य सरकार ने दूसरे विकल्पों पर विचार कर रही है। कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ के निर्देशन में ये योजनाएं बनाई जा रही हैं।

कैग की रिपोर्ट में उठ चुके एग्रो माल पर सवाल

हरियाणा के चारों एग्रो माल पहले भी विवादों में रहे हैं। देश के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने 2014 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हरियाणा सरकार ने परियोजना रिपोर्ट बनाने और अन्य संबंधित काम पूरे किए बगैर ही एग्रो माल की परियोजना पर काम शुरू कर दिया था।

कैग का कहना था कि वास्तविक जरूरत, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, नक्शे की मंजूरी, रेखांकन जैसे काम पूरा किए बिना इन माल के निर्माण के ठेके दिए गए हैं। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार और कैग के दावों से सहमत नहीं हैं और कहते हैं कि सरकार को इन्हें चलाना ही नहीं आया।

मार्केटिंग बोर्ड की स्टडी रिपोर्ट में भी फेल साबित हुए

हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड के मुख्य प्रशासक की ओर से वर्ष 2016 में इन सभी एग्रो माल की व्यावहारिकता को लेकर स्टडी करने का सुझाव दिया गया था। तब बोर्ड की ओर से चारों जिलों रोहतक, पानीपत, करनाल और पंचकूला में माल की व्यावहारिक स्थिति को परखा गया। इसी स्टडी में सामने आया कि चारों एग्रो माल किसानों तथा कृषि उत्पादों की खरीद फरोख्त के लिए उपयोगी नहीं हैं। इसी स्टडी रिपोर्ट के आधार पर कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ बार-बार इस परियोजना पर पैसा बर्बाद कर दिए जाने का आरोप लगाते हैं।

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यह था पिछली हुड्डा सरकार का सपना

एग्रो माल बनाने का उद्देश्य किसानों को एक ही छत के नीचे सुविधाएं उपलब्ध कराना, उनके लिए बीज, खाद व दवा की दुकानें खोलना, कृषि उपकरणों की बिक्री करना तथा विशेष उत्पादों की बिक्री की अनुमति देना था। यहीं पर बैठकर किसानों के लिए सेमीनार कराए जाने थे। हरियाणा कृषि विपणन बोर्ड द्वारा घर-घर जाकर सब्जी बेचने की परियोजना शुरू की जानी थी। इन सब्जियों को किसान माल तक लेकर आते। फिर यहीं से सब्जियों व फलों की बिक्री होती। मगर ऐसा हो नहीं पाया है।

पंचकूला मॉल का प्रथम तल जीएसटी विभाग को देने की योजना

पंचकूला के एग्रो मॉल के व्यावसायिक इस्तेमॉल की रूपरेखा लगभग तैयार कर ली गई है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विभाग को इस मॉल का पहला तल किराये पर देने अथवा बेचने की योजना है। इसके लिए विभाग और हरियाणा कृषि विपणन बोर्ड के अधिकारियों में बातचीत चल रही है। मॉल का आधा फ्लोर टेलीकॉम कंपनियों को किराये पर दिया जाएगा।

करनाल के मॉल में स्मार्ट सिटी अथॉरिटी के बनेंगे दफ्तर

करनाल के एग्रो मॉल के ग्राहक अभी सामने नहीं आए हैं। राज्य सरकार इस मॉल को किसी भी बड़ी कंपनी को कॉमर्शियल मॉल बनाने के लिए बेचने का मन बना चुकी है। बात बनने तक इस मॉल की ऊपरी मंजिल पर स्मार्ट सिटी अथॉरिटी करनाल का दफ्तर खोला जा सकता है। इसके लिए किराये का मोल-भाव चल रहा है। वहीं ग्राउंड फ्लोर पर किसान सुविधा केंद्र बनाने की योजना है।

करनाल शहर धान खासकर बासमती के विदेशों में निर्यात का केंद्र है। इसलिए सरकार इस मॉल को निर्यातकों की मदद से प्रदर्शनी स्थल और बिक्री केंद्र के रूप में इस्तेमॉल करने पर विचार कर रही है। मार्केटिंग बोर्ड के मुख्य प्रशासक मंदीप सिंह बराड़ इस दिशा में गंभीर प्रयास कर रहे हैं।

पानीपत के मॉल में निगम का दफ्तर खोलने की योजना

पानीपत के एग्रो मॉल में नगर निगम का दफ्तर खोलने के लिए बातचीत चल रही है। सरकार को आशंका है कि नगर निगम एक बार इस मॉल को किराये पर लेने के बाद शायद किराये का भुगतान न करे। इसलिए बात अटकी हुई है। मार्केटिंग बोर्ड किराये के बारे में अपनी तसल्ली अच्छी तरह से करने के बाद ही शहरी स्थानीय निकाय विभाग के साथ कोई समझौता कर सकता है।

रोहतक के मॉल में किसान सुविधा केंद्र की योजना

रोहतक के एग्रो मॉल पर सबसे अधिक लागत आई है। इस मॉल पर अकेले 98 करोड़ रुपये के आसपास खर्च हुए है। इस मॉल का कॉमर्शियल यूज होगा। यहां भी सरकार किसान सुविधा केंद्र बनाने की संभावनाओं पर विचार कर रही है। इस मॉल की अधिकतर दुकानें या तो बिक चुकी या किराये पर हैं या फिर मार्केटिंग बोर्ड  के साथ बातचीत अंतिम दौर में चल रही है।

बगैर प्लानिंग के बना दिए मॉल : धनखड़

” पिछली हुड्डा सरकार ने बिना सोचे समझे और बगैर किसी प्लानिंग के एग्रो मॉल बना दिए थे। दुनिया के विभिन्न देशों में एग्रो मॉल इसलिए कामयाब हुए क्योंकि वहां बड़ी कंपनियां मार्केट में बिजनेस करती हैं। हरियाणा की स्थिति ऐसी नहीं है। हम इन सभी मॉल को बेचने के लिए तैयार हैं। यदि कोई किराये पर लेना चाहता है तो देंगे। धीरे-धीरे हम इन मॉल पर खर्च हुई राशि की भरपाई करने की ओर बढ़ रहे हैं।

सरकार को मॉल चलाने नहीं आए : हुड्डा

” एग्रो मॉल बनाने का हमारा कांसेप्ट अच्छा था। किसानों को उनके उत्पादों का सही दाम दिलाने के लिए यह कदम उठाया गया था। मौजूदा सरकार को यह मॉल चलाने ही नहीं आए। जब गुजरात में यह मॉडल सफल हो सकता है तो फिर हरियाणा में क्यों नहीं। सरकार की नीयत साफ हो तो इन्हें संचालित कर किसानों को फायदा पहुंचाया जा सकता है।