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टीचर से राष्ट्रपति की कुर्सी तक… जानें डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन की रोचक बातें

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डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शुरुआती जीवन अत्यंत अभाव में बीता. उनकी प्रारंभिक शिक्षा तिरुमनी में ही हुई. आगे की शिक्षा के लिए उनके पिता ने तिरुपति के एक क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल में उनका दाखिला करवा दिया. चार वर्षों तक वहां शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से पढ़ाई की.

नई दिल्ली: पांच सितंबर 1888 को तमिलनाडु के एक छोटे से गांव तिरुमनी के एक ब्राह्मण परिवार में जब सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन वह देश के राष्ट्रपति बनेंगे और उनके सम्मान में पूरा देश शिक्षक दिवस मनाएगा. भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शुरुआती जीवन अत्यंत अभाव में बीता. उनकी प्रारंभिक शिक्षा तिरुमनी में ही हुई. आगे की शिक्षा के लिए उनके पिता ने तिरुपति के एक क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल में उनका दाखिला करवा दिया. चार वर्षों तक वहां शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से पढ़ाई की. राधाकृष्णन ने 1906 में दर्शनशास्त्र में एमए किया. वह एक ऐसे मेधावी छात्र थे कि उन्हें उनके पूरे छात्र जीवन में स्कॉलरशिप मिलती रही.

एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1909 उन्हें मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में अध्यापक के तौर पर नौकरी मिली, जहां उन्होंने सात वर्षों तक छात्रों को दर्शनशास्त्र पढ़ाया. 1916 में उन्हें मद्रास रेजिडेंसी कॉलेज में दर्शन शास्त्र में असिसटेंट प्रोफेसर की नौकरी मिली. 1918 में मौसूर यूनिवर्सिटी ने उन्हें प्रोफेसर के रूप में चुना. राधाकृष्णन यहीं नहीं रुके, बाद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भारतीय दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बने. कुछ दिनों तक वहां पढ़ाने के बाद डॉ राधाकृष्णन स्वेदश लौट आए. जिस यूनिवर्सिटी से उन्होंने एमए की पढ़ाई की थी उसी यूनिवर्सिटी में उन्हें उप-कुलपति बनाया गया, लेकिन कुछ ही दिनों के बाद वहा बनारस चले गए और हिंदू विश्वविद्यालय के उप-कुलपति बन गए. 1903 में सिवाकामू के साथ उनका विवाह हुआ.

नेहरू के आग्रह पर राजनीति में आए
1947 में जब देश आजाद हुआ तब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डॉ. राधाकृष्णन से राजदूत के तौर पर सोवियत संघ के साथ राजनीतिक कार्यों पर काम करने का आग्रह किया. उनकी बात को मानते हुए उन्होंने 1947 से 1949 तक वह संविधान सभा के सदस्य को तौर पर काम किए. उसके बाद 1952 तक डॉ. राधाकृष्णन रूस की राजधानी मास्को में भारत के राजदूत पद पर रहे. 13 मई 1952 को उन्हें देश का पहला उपराष्ट्रपति बनाया गया. दस वर्षों तक बतौर उपराष्ट्रपति जिम्मेदारी निभाने के बाद 13 मई 1962 को उन्हें देश का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया. राष्ट्रपति रहते हुए राधाकृष्णन के सामने चीन और पाकिस्तान से युद्ध जैसी मुसीबतें आईं.

भारत रत्न से नवाजे गए
शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में उनके योगदाने के लिए सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा. उन्के सम्मान में पांच सितंबर 1962 से देश शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है. 1962 में ही उन्हें ब्रिटिश एकेडमी का सदस्य बनाया गया. डॉ. राधाकृष्णन अपने राष्ट्रप्रेम के लिए विख्‍यात थे. इंग्लैंड की सरकार ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ मेरिट’ स्म्मान से सम्मानित किया. उनके मरणोपांत 1975 में अमेरिकी सरकार ने उन्हें टेम्पल्टन पुरस्कार से सम्मानित किया.

दोबरा राष्ट्रपति नहीं बनने की उन्होंने खुद की थी घोषणा
बतौर राष्ट्रपति 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) 1967 को जब वह देश को संबोधित कर रहे थे, तब उन्होंने खुद इस बात की घोषणा की थी कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह दोबारा देश के राष्ट्रपति नहीं बनेंगे. बतौर राष्ट्रपति यह उनका आखिरी संबोधन था. डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शनशास्त्र और धर्म पर कई किताबें लिखी. ‘गौतम बुद्ध : जीवन और दर्शन’, ‘धर्म और समाज’, ‘भारत और विश्व’ उनमें प्रमुख थे. 17 अप्रैल 1975 में लम्बी बीमारी के बाद उनका देहांत हो गया.

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