BREAKING NEWS
post viewed 80 times

सबसे ऊपर न्यायपालिका, जज नहीं

upfront_1_1_1525263777_618x347

अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने एक बार कहा था, ‘‘हम एक राष्ट्र के रूप में उस स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां हमें संविधान को कोर्ट से और कोर्ट को खुद से बचाने की पहल करनी होगी.’’ भारत का सर्वोच्च न्यायालय ऐसे ही संकट से गुजर रहा है. हमारे जज आपस में पूरी तरह विभाजित हैं. वरिष्ठ जजों की मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र को लिखी गई चिट्ठियां आपसी विश्वास की भारी कमी का ही संकेत हैं.

प्रधान न्यायाधीश को अब पूर्ण बेंच की बैठक बुलानी चाहिए, जैसा कि उनका उत्तराधिकारी बनने की कतार में खड़े रंजन गोगोई और मदन लोकुर ने आग्रह किया है. पिछले कुछ महीनों के दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रमों से, जिनमें चार असंतुष्ट जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस, महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस और उसे खारिज किया जाना शामिल है, हमारी न्यायपालिका वैधता के अप्रत्याशित संकट का सामना कर रही है. अभूतपूर्व संस्थागत मुद्दों पर विमर्श के लिए न्यायिक पक्ष की ओर से पूर्ण बेंच की सुनवाई अपरिहार्य लग रही है.

हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि राजनैतिक विपक्ष समझदारी दिखाएगा और उपराष्ट्रपति के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती नहीं देगा, बावजूद इसके कि उसके इस तर्क में कुछ दम है कि राज्यसभा के सभापति नोटिस दिए जाने भर से ही अपने तईं आरोपों पर कोई फैसला नहीं ले सकते और उसे ‘काल्पनिक’ और ‘कुत्सित’ नहीं करार दे सकते.

यदि आरोपों में जरा भी वास्तविकता है और जरूरी संख्या में सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं, तो उसे उन्हें आदर्श रूप में स्वीकार करना चाहिए और इसका निर्धारण जांच कमेटी पर छोड़ देना चाहिए था. साथ ही यह तर्क देना भी उतना ही गलत है कि उनके पास महाभियोग प्रस्ताव की विषयवस्तु को जांचने का कोई अधिकार नहीं है.

उपराष्ट्रपति को देखना चाहिए कि क्या इसमें जांच की आवश्यकता है? वे जांच कमेटी की भूमिका नहीं निभा सकते. जांच कमेटी ही तय करेगी कि क्या ‘प्रमाणित कदाचार’ हुआ है? कोई भी आरोप निश्चित नहीं हो सकता, इसलिए उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू का इसे खारिज करने का आदेश, जिसमें कहा गया कि महाभियोग प्रस्ताव में ही ‘शायद’, ‘ऐसा लगता है’ जैसे शब्द शामिल हैं और ‘साबित कदाचार’ प्रमाणित नहीं है, ऐसा है जिसका समर्थन नहीं किया जा सकता है.

अधिकांश मुख्य न्यायाधीश बेंचों की अगुआई करने के लिए ऐसे जजों को चुनते हैं, जिनके साथ उनकी समझ बेहतर हो और इसीलिए मुख्य न्यायाधीश की राय को निरपवाद रूप से बहुमत की राय माना जाता है.

तीन तलाक वाला मामला एक अपवाद था, जिसमें प्रधान न्यायाधीश जे.एस. खेहर ने जुदा राय रखी थी. यहां तक कि प्रधान न्यायाधीश पूरी बेंच की ओर से फैसला लिख सकते हैं, जैसा कि प्रधान न्यायाधीश आर.सी. लाहोटी ने अल्पसंख्यकों के अधिकार से जुड़े पीए इनामदार (2005) के मामले में किया था, जिसमें उन्होंने सभी सात जजों की ओर से फैसला लिखा था.

न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने बचन सिंह मामले में (1980), जिसमें ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ का विचार आया, कहा था कि मृत्युदंड या उम कैद का निर्णय जजों के निजी दर्शन पर निर्भर है.

यहां तक कि अगर हम स्वीकार करते हैं कि वर्तमान प्रधान न्यायाधीश ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं किया है, लेकिन भविष्य में ऐसा होने की आशंका है. सीमित अधिकारों के विचार के रूप में संविधानवाद किसी भी संवैधानिक प्राधिकार के सर्वसत्तावाद के खिलाफ एकमात्र कवच है और इसलिए ‘मास्टर ऑफ रोल्स’ (जजों को मामले आवंटित करने का अधिकार) के रूप में प्रधान न्यायाधीश के अधिकारों की समीक्षा करने की जरूरत है.

बेशक, वह उच्च संवैधानिक प्राधिकारी हैं और सम्मान के हकदार हैं, लेकिन उनकी प्रशासनिक कार्रवाई, जिसमें बेचों का गठन शामिल है, मनमानी, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाली और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत की विरोधाभासी नहीं हो सकती. संविधान सर्वोच्च है, न कि प्रधान न्यायाधीश.

लेखक संवैधानिक कानूनों के विशेषज्ञ और एनएएलएसआर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ हैदराबाद के कुलपति हैं.

SHAREShare on Facebook0Share on Google+0Tweet about this on TwitterShare on LinkedIn0

Be the first to comment on "सबसे ऊपर न्यायपालिका, जज नहीं"

Leave a comment

Your email address will not be published.


*