जब उत्तर भारत में सर्दी समाप्ति की ओर है तो यहां करते हैं लोग बर्फबारी का इंतजार। बर्फ पर अटखेलियां आपको भी लुभाती हैं तो उत्तराखंड के चमोली स्थित औली से मुफीद जगह देश में कहीं और नहीं। हालांकि मौसम अनुकूल न होने की वजह से इस बार यहां अंतरराष्ट्रीय स्कीइंग रेस का आयोजन टल गया, पर कुदरत के इस नायाब उपहार को निहारने वालों की भीड़ में कोई कमी नहीं आई है। तो फिर आज चलते हैं औली की सैर पर..

टीवी चैनलों, अखबारों में बर्फ से लकदक पहाड़ों के नजारे देखने भर से ही सर्द से सर्द मौसम में भी गर्मजोशी छा जाती है तो जब आप ऐसे स्थलों पर चले जाएं तो क्या होगा? यकीनन ऐसी कल्पनाओं से भी खूबसूरत है औली। एक तरफ पूरी दुनिया जहां कोरिया में विंटर ओलंपिक के रोमांच में डूबी है तो हम भी यह क्यों भूलें कि हमारे देश में भी एक ऐसी जगह है जहां बर्फ पर स्कीइंग का आनंद लेने के लिए दुनिया भर से पर्यटक खिंचे चले आते हैं। पर केवल सर्दियों के मौसम में ही नहीं बल्कि इसकी सुंदरता कुछ ऐसी है कि पर्यटकों की भीड़ यहां हर मौसम में बनी रहती है। बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़ों पर सूर्योदय हो या सूर्यास्त, औली हर पहर में एक अलग रंग में खूबसूरती बिखेरता नजर आएगा और यह निर्णय करना मुश्किल होगा कि इस सौंदर्य का कौन सा रंग सबसे खूबसूरत है। दिन के वक्त सूर्य की रोशनी से यहां बर्फ से पटे पहाड़ चांदी-सी चमक बिखेरते हैं, तो शाम के समय आप सूरज और चांद को धरती के बिल्कुल पास-पास महसूस करेंगे। आपने पहले भी बर्फबारी का आनंद लिया होगा लेकिन यहां बर्फ इतना अद्भुत है कि आप उसे चख भी सकते हैं। चमोली स्थित हिम क्रीड़ा स्थल को उत्तराखंड का स्वर्ग कहा जाता है। पूरी दुनिया इसे बेहतरीन स्की रिजॉर्ट के रूप में जानती है पर जो केवल कुदरत को करीब से निहारने का जुनून लिए होते हैं उनके लिए औली कुदरत का वरदान है। यहां केवल बर्फ ही नहीं, साथ में है भरपूर चमकती हरियाली. हरे-भरे खेत, छोटे-बड़े देवदार के पेड़ों के बीच ऊंची-नीची चट्टानों पर बिछी मुलायम हरी घास, पतले और घुमावदार रास्ते और जहां तक नजर आए, वहां तक केवल पहाड़ ही दिखते हैं जो इन दिनों चांदी सा चमक बिखेर रहे हैं।

अल्पाइन स्कीइंग का अधिकृत केंद्र

जोशीमठ से 16 किमी. दूर आगे औली उत्तरांचल के ऊपरी भाग में स्थित है। रफ्तार के रोमांच को तैयार था यह इलाका कि बर्फबारी अनूकूल न होने की वजह से इस पर ब्रेक लगाना पड़ा। पर मौसम का मिजाज देखिए कि जब प्रशासन ने इसकी घोषणा कि इसके अगले ही दो दिन बाद जमकर बर्फबारी हो गई यहां। दरअसल, स्कीइंग रेस के बनाई जाने वाली कृत्रिम बर्फ तभी टिकी रह सकती है, जब तापमान पांच डिग्री से ज्यादा न हो। गौरतलब है कि 16 फरवरी से यहां फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल स्कीइंग (एफआइएस) रेस का आयोजन होना था। इस स्थल की सबसे खास विशेषता यही है कि उत्तराखंड में स्थित औली ही एकमात्र स्थान है, जिसे एफआइएस ने स्कीइंग रेस के लिए अधिकृत किया हुआ है। वैसे, उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद ही औली में राष्ट्रीय स्तर की स्कीइंग चैंपियनशिप का आयोजन शुरू किया गया पर इसे विशिष्ट पहचान वर्ष 2011 के सैफ विंटर खेलों से मिली। इस दौरान यहां स्कीइंग की कई प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। दरअसल, एफआइएस के मानकों के अनुसार स्कीइंग रेस कराने के लिए केंद्रों में ढलान, बर्फ बनाने की वैकल्पिक व्यवस्था, विदेशी खिलाडिय़ों को ठहराने की समुचित व्यवस्था, संपर्क मार्ग आदि की स्थिति देखी जाती है। औली इन मानकों पर खरा उतरता है। यहां स्कीइंग के लिए 1300 मीटर लंबा स्की ट्रैक है, जो फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल स्कीइंग के मानकों को पूरा करता है।

इससे बेहतर ढलान और कहीं नहीं

औली का मुख्य आकर्षण है यहां बर्फ से लकदक ढलानें। 1640 फीट की गहरी ढलान में स्कीइंग का जो रोमांच यहां है वह दुनिया में दूसरी जगहों पर शायद ही हो। इसलिए औली की ढलानें स्कीयरों के लिए बेहद मुफीद मानी जाती हैं। जाहिर है यहां की ढलानें शिमला (हिमाचल) और गुलमर्ग (कश्मीर) की ढलानों से बेहतर मानी जाती हैं। इसलिए यदि आपने शिमला या गुलमर्ग में ही स्कीइंग का आनंद लिया है तो एक बार यहां आकर स्कीइंग का अनुभव लें, यकीनन औली से प्यार कर बैठेंगे। 2011 में विंटर सैफ गेम्स के बाद तो देश-दुनिया के लोगों औली की बर्फीली ढलानों का आनंद लेने का क्रेज बढ़ गया है। यहां खिलाडिय़ों के लिए स्कीलिफ्ट है, जबकि दर्शकों और निर्णायकों के लिए खास ग्लास हाउस भी बनाया गया है। इस हिमक्रीड़ा केंद्र में उत्तराखंड पर्यटन विभाग और गढ़वाल मंडल विकास निगम की ओर से स्कीइंग का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। स्कीइंग प्रतियोगिता में सलालम की चर्चा खास होती है। इसमें स्कीयर को बर्फीली ढलान पर तकरीबन 800 फीट की दूरी तय करनी होती है। एक निश्चित दूरी पर पोल लगाए जाते हैं। इनकी संख्या तक 55 से अधिक होती है। प्रतिभागी को दोनों पोल के बीच से होकर गुजरना होता है। इसमें भी गति व समय के आधार पर जीत तय होती है। चमोली के जिलाधिकारी आशीष जोशी के मुताबिक, ‘औली और जोशीमठ में मेहमानों के ठहरने की सारी व्यवस्था हो चुकी है। सड़क और रोपवे से औली में आवाजाही सुचारू है। चेयर लिफ्ट भी दुरुस्त की जा चुकी है। औली को बस इंतजार है तो अपने आगंतुकों का।’

सामने होगी नंदा देवी!

आप यहां नंदा देवी के अलावा त्रिशूल, द्रोणागिरि, कामेट, नीलकंठ समेत बर्फ से लकदक अन्य चोटियों को जब सामने से देखेंगे तो हर नजारा कैमरे में कैद करने का जी चाहेगा। ये सामने से ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे वे सामने खड़ी हों। शहर की भीड़भाड़-शोरगुल और दूर मंद-मंद ठंडी हवाओं का झोंका आपको ताजा एहसास से भर देगा। ऊंचे-ऊंचे सफेद चमकीले पहाड़ों पर धुंध में लिपटे बादल, मीलों तक जमी बर्फ का प्राकृतिक नजारा आप हमेशा के लिए संजो कर रखना चाहेंगे। यहां पहाड़ सूरज को गले लगाते प्रतीत होते हैं। जब आप स्कीइंग के साथ ही यहां नंदा देवी पर्वत के पीछे से सूर्योदय का नजारा देख लेंगे तो औली किसी ख्वाब-की दुनिया सा प्रतीत होगा। कभी गेहुंआ, केसरिया तो कभी नारंगी तो कभी लाल रंग की अद्भुत चमक का नजारा पेश करता है। यदि आप चांद और सूरज के अनूठे मिलन को देखना चाहते हैं, तो यहां तड़के इसका दीदार कर सकते हैं।

यह है संजीवनी शिखर

औली को औषधीय वनस्पतियों का भंडार भी माना जाता है। इस खूबी के कारण इसे संजीवनी शिखर का भी नाम मिला है। कहते हैं कि रामायण काल में जब हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने हिमालय आए तो उन्होंने औली के टीले में रुककर यहां से ही द्रोणागिरि पर्वत को देखा और उन्हें संजीवनी बूटी का दिव्य प्रकाश नजर आया। औली के इसी संजीवनी शिखर पर हनुमानजी का भव्य मंदिर भी है। यहां पर्यटकों की ज्यादा भीड़भाड़ न होने की वजह से और भी आनंद लिया जा सकता है, जहां आप बिना किसी जल्दबाजी या अफरातफरी के इस खूबसूरत जगह को देख सकते हैं। बद्रीनाथ, गोपेश्र्वर, नंदा देवी, नील कंठ, त्रिशूल आदि के रूप में यहां मिथकों और धार्मिक आकर्षणों का खजाना बसता है।

ये रोपवे है खास

एशिया में गुलमर्ग रोपवे को सबसे लंबा माना जाता है, जबकि इसके बाद औली-जोशीमठ रोपवे का नंबर है। करीब 4.15 किलोमीटर लंबे इस रोपवे की आधारशिला 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रखी थी और यह 1994 में बनकर तैयार हुआ। देवदार के जंगलों के बीच से यह रोपवे 10 टॉवरों से गुजरता है। जिग-जैक पद्धति पर बने इस रोपवे में आठ नंबर टॉवर से उतरने-चढ़ने की व्यवस्था है।

ऐतिहासिक परिदृश्य में औली

वर्ष 1942 में गढ़वाल के अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर बर्नेडी औली पहुंचे थे। उन्हें यहां का नैसर्गिक सौंदर्य इस कदर भाया कि सर्दी में दोबारा यहां पहुंच गए। उन्होंने यहां की बर्फीली ढलानों में पहली बार स्कीइंग की। वर्ष 1972 में आइटीबीपी के डिप्टी कमांडेंट हुकुम सिंह पांगती ने भी कुछ जवानों के साथ औली में स्कीइंग की। आइटीबीपी के अधिकारियों को यहां की बर्फीली ढलानें बेहद पसंद आईं। 25 मार्च, 1978 को यहां भारतीय पर्वतारोहण एवं स्कीइंग संस्थान की स्थापना हुई।

कैमरे में उतार लें स्लीपिंग ब्यूटी

बर्फबारी के बाद जब मौसम खुलता है तो औली की स्लीपिंग ब्यूटी का आकर्षण हर किसी को खींचता है। आखिर क्या है यह स्लीपिंग ब्यूटी, मन में सवाल उठना लाजिमी है। असल में औली के ठीक सामने का पहाड़ बर्फ से ढकने पर लेटी हुई युवती का आकार ले लेता है। इस दृश्य को देखना और कैमरों में कैद करने के लिए होड़ लगी रहती है। इसे ही स्लीपिंग ब्यूटी के नाम से जानते हैं।

 

चेयरलिफ्ट का रोमांच

सैलानी यहां होने वाली स्कीइंग स्पर्धा और आस-पास के कुदरती नजारों का भरपूर लुत्फ उठा सकते हैं। इसके लिए औली में आठ सौ मीटर लंबी चेयर लिफ्ट की सुविधा भी है, जिसमें बैठकर औली का विहंगम दीदार किया जा सकता है। इस खुली चेयर लिफ्ट से सैर का अलग ही रोमांच है। यही नहीं, स्कीइंग देखने के लिए अलग-अलग स्थानों पर सात ग्लास हाउस भी बनाए गए हैं, जिनसे औली की खूबसूरत वादियों को निहारा जा सकता है।

ऐसी झील कहीं देखी होगी!

विश्र्वभर में सबसे अधिक ऊंचाई पर कृत्रिम झील औली में स्थित है। 25 हजार किलोलीटर की क्षमता वाली इस झील को वर्ष 2010 में बनाया गया। बर्फबारी न होने पर इसी झील से पानी लेकर औली में कृत्रिम बर्फ बनाई जाती है। इसके लिए फ्रांस में निर्मित मशीनें लगाई गई हैं।