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राजस्थान में आसान नहीं कांग्रेस-बसपा के बीच गठबंधन, ‘अपनो’ ने ही बढ़ाई मुश्किलें

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राजस्थान में 59 सीटें एससी-एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं जबकि करीब 20 सीट ऐसी और है जहां पर दलित वोट बैंक प्रभावी स्थिति में है.

जयपुर: राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के बसपा से गठबंधन की खबरों ने प्रदेश के दलित कांग्रेसी नेताओं में खलबली मचा दी है. यही वजह है कि अशोक गहलोत के जयपुर प्रवास के 3 दिनों के दौरान प्रदेश के लगभग सभी कांग्रेस दलित नेताओं ने मुलाकात कर उनके सामने अपनी पीड़ा रखी. अशोक गहलोत के समक्ष दलित नेताओं ने सवाल रखा कि अगर बसपा को राजस्थान में दलित बहुल सीटों पर टिकट दिए जाते हैं तो कांग्रेस के उन दलित नेताओं का क्या होगा जो पिछले साढ़े चार साल से पार्टी के लिए मेहनत कर रहे हैं.

देश में बीजेपी विरोधी जो महागठबंधन तैयार हो रहा है उसमें बहुजन समाज पार्टी एक अहम हिस्सा है और कांग्रेस बसपा के साथ राजस्थान में भी गठबंधन करने जा रही है ऐसी चर्चाएं हैं. हालांकि अभी आधिकारिक तौर पर ऐसा कुछ सामने नहीं आ पाया है लेकिन इन चर्चाओं मात्र से ही राजस्थान के दलित नेताओं में हड़कंप मचा हुआ है. अशोक गहलोत तीन दिन राजस्थान के दौरे पर रहे. इस दौरे के दौरान प्रदेश के बड़े दलित नेताओं ने उनसे मुलाकात कर अपनी चिंताएं जाहिर की. हालांकि अशोक गहलोत ने उनको आश्वस्त किया है कि दलित नेताओं की टिकटों का पूरा ख्याल रखा जाएगा. लेकिन राजस्थान के दलित नेता इस आश्वासन से भी संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं.

यहां हम आपको बता दें कि राजस्थान में 59 सीटें एससी-एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं जबकि करीब 20 सीट ऐसी और है जहां पर दलित वोट बैंक प्रभावी स्थिति में है. यानी राजस्थान में 80 से अधिक सीटों पर जातिगत समीकरण के आधार पर दलित मतदाताओं की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है. हालांकि कांग्रेस के नेता यह मान रहे हैं कि अभी ऐसा कोई फॉर्मूला नहीं बना है लिहाजा अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा.

गठबंधन की सुगबुगाहट से दलित कांग्रेसी नेता बेचैन
बसपा के साथ गठबंधन की निगाहों ने राजस्थान के उन दलित कांग्रेसी नेताओं के परेशानियां बढ़ा दी हैं जो दलित बाहुल्य सीट पर अपनी दावेदारी पुख्ता मान रहे हैं. इनमे अगर बड़े दलित नेताओं की बात की जाए तो शंकर पन्नू पीलीबंगा और रायसिंहनगर नगर से टिकट की दावेदारी ठोंक रहे हैं. परसराम मोरदिया सीकर के धोंद से, मास्टर भंवर लाल सुजानगढ़ से, हनुमान प्रसाद पिलानी से, भरत राम मेघवाल पीलीबंगा से, पूर्व आईपीएस विजेंद्र झाला जोधपुर से, रमेश मीणा करौली सपोटरा से, भजनलाल जाटव, भरतपुर की वैर से, महेंद्रजीत मालवीय बागीदौरा से और बाबूलाल नागर बगरू विधानसभा सीट से टिकट के प्रबल दावेदार हैं. बसपा के साथ गठबंधन की खबरों पर दलित नेताओं का कहना है कि राजस्थान में कांग्रेस बेहद मजबूत स्थिति में है लिहाजा बसपा के साथ गठबंधन की कोई आवश्यकता ही नहीं है.

2008 के बसपा को मिली सिर्फ 6 सीटें
2008 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में बसपा ने 50 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था जिनमें 6 सीटें ही बसपा जीत पाई थीं. लेकिन कांग्रेस ने इन्ही 6 विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई और बाद में दल-बदल कर इन्हें कांग्रेस में ही शामिल कर लिया था. पिछले 10 सालों में बसपा की स्थिति कमजोर हुई है. लिहाजा राजस्थान में बसपा अपने दम पर चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं है. लेकिन फिर भी बसपा के नेता यह चाहते हैं कि गठबंधन के तहत राजस्थान में उन्हें कम से कम 25 सीटें दी जाएं लेकिन कांग्रेस में इस बात पर सहमति नहीं है. कांग्रेस बसपा को 10 से अधिक सीटें नहीं देना चाहती. लेकिन सवाल यह है कि अगर दोनों पार्टियों के आलाकमान के बीच 15 सीटों पर सहमति बन जाती है तो राजस्थान के उन 15 सीटों के दलित नेताओं का क्या होगा जो पिछले उन सीटों पर मेहनत कर रहे हैं. ऐसे में क्या इन नेताओं की नाराजगी से कांग्रेस को बसपा के साथ इस गठबंधन से नुकसान तो नहीं होगा. गठबंधन से पहले कांग्रेस नेताओं को इस सवाल का जवाब भी तलाशना होगा.

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