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समलैंगिकता पर सुनवाई शुरू, वकील मुकुल रोहतगी ने महाभारत के शिखंडी का दिया उदाहरण

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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एम खानविलकर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा की बेंच सुनवाई शुरू हुई है.

नई दिल्ली: समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने वाली IPC की धारा 377 के खिलाफ दायर याचिकाओं पर संविधान पीठ ने मंगलवार को सुनवाई शुरू की. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एम खानविलकर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा की बेंच सुनवाई शुरू हुई है. केन्द्र सरकार की ओर से ASG तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय चाहिए. सुनवाई के दौरान आगे चलकर इस मसले पर अपना रुख बाद में साफ करेगी.

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए पूर्व अटॉनी जनरल मुकुल रोहतगी ने दलील शुरू की. कहा- निजता के अधिकार के मामले की सुनवाई करने वाली 9 जजों की बेंच में से छह जजों की राय थी कि IPC 377 को अपराध के दायरे में लाने वाला सुप्रीम कोर्ट का पुराना फैसला ग़लत था.

याचिकाकर्ता के वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि LGBT समुदाय को 377 IPC के इस 165 साल पुराने कानून के चलते सामाजिक प्रताड़ना और जॉब से हाथ धोना पड़ा है. LGBT समुदाय समाज के दूसरे तबके की तरह ही है, सिर्फ उनका सेक्सुअल रुझान अलग है. ये सवाल किसी की व्यक्तिगत इच्छा का भी नहीं है, बल्कि उस रुझान का है, जिसके साथ कोई पैदा हुआ है. क्या महज रुझान अलग होने के चलते उनके अधिकारों से उन्हें वंचित कर दिया जाए. वक्त के साथ मूल्य बदलते हैं, 160 साल पहले जो चीज नैतिक मूल्यों के दायरे में आती थी, वह आज नहीं आती.

मुकुल रोहतगी ने कहा IPC 377  “sexual morality” को ग़लत तरीके से परिभाषित करती है. 1680 के ब्रिटिश काल के नैतिकता कोई कसौटी नहीं है. प्राचीन भारत में इसको लेकर दृष्टिकोण अलग था. रोहतगी ने अपनी दलीलों की पुष्टि के लिए महाभारत काल के शिखंडी का उदाहरण दिया.

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