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हम डर को छोड़ते हैं या वो हमें एक दिन छोड़ कर चला जाता है?क्या होता है जब इंसान डरना छोड़ देता है?

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हम डर को छोड़ते हैं या वो हमें एक दिन छोड़ कर चला जाता है?

जिनके सिर में भंवर पड़ा करते हैं, उनको पानी से डर होता है. ऐसा नानी बताती थीं. मेरे सिर में भी है, ऐसा कहा गया है मुझसे. मैंने देखा नहीं. अपना सिर ऊपर से देख सकती तो शायद कन्फर्म कर लेती. पर मम्मी भी कहती हैं. ठीक ही होगा.

मेरे भाई के भी भंवर पड़ते हैं. उसको भी पानी से बचकर रहने के लिए कहा गया है. कुछ ज्यादा ही सीरियसली लिया है उसने तो. नहाने में भी पानी से दूर दूर रहता था बचपन में. अब रहता है या नहीं, पता नहीं. बोल दूं तो सिर पे सवार हो जाएगा.

इस डर की वजह से कभी घरवालों ने पानी में नहीं जाने दिया. ज्यादा से ज्यादा गंगा नहान के समय नानी और मामा अपने साथ ले जाते थे, और डुबकी लगवा देते थे. आँख नाक मुंह सब डूब जाते थे. लगता था अब तो टाटा बाय बाय वाली नौबत आ गई. नानी हंसते हुए कहती थीं, गंगा तो माँ होती है. डूबने थोड़ी देगी.

कुछ दिन तक सपने आते थे. बड़ा सा भंवर है, उसमें चक्कर खा रहे हैं लोग. कोई हंस रहा है. कोई चीख रहा है. कोई गुलाटियां मार रहा है. बस मैं ही हूँ जो किनारे से देख रही है. वो जा नहीं सकती. उसके सिर पर भंवर पड़ते हैं. ये भंवर उसके लिए नहीं है. वो डर भंवर से निकल कर सिर पर सवार हो जाता था. गोल गोल घूमता हुआ वहीं पर. शिशुपाल के सिर पर घूमते हुए सुदर्शन की तरह.

उस भंवर के सपने मुझे कई साल तक आते रहे. फोटो: पिक्साबे उस भंवर के सपने मुझे कई साल तक आते रहे. फोटो: पिक्साबे

2003 में एक हादसा हुआ था घर में. गैस सिलिंडर ने आग पकड़ ली थी. नानी वहीं बैठी थीं, खाना बना रही थीं. चावल की सीटी के बीच में सुनाई ही नहीं दिया कब गैस सिलिंडर अचानक से लीक हुआ और आग पकड़ धू धू होने लगा. नानी नीचे बैठ खाना बनाती थीं, इस धक्के ने उनके होश उड़ा दिए. पुराने घरों में ऊपर खप्पर की छत होती है. सिलिंडर की लपटें वहां तक पहुँच रही थीं. बर्तन की रैक पर रखे प्लास्टिक के बर्तन पिघल कर चू गए थे. उन्हीं में सबसे ऊपर मेरा विनी द पूह वाला पीला लंचबॉक्स था. वो आधा पिघल कर दीवार से जा लगा था.

जब आग काबू से बाहर होती है तो नरक दिखा देती है. फोटो: Getty Imagesजब आग काबू से बाहर होती है तो नरक दिखा देती है. फोटो: Getty Images

हड़बड़ी में मामा दौड़े आए. नानी को उठाया. उन्हें लेकर बाहर भागे. मैंने अपनी बहनों को बाहर भेजा. दमकल वालों को फ़ोन लगाया. उनको एड्रेस देकर बताया कि आग लग गई है. 9 साल की बच्ची मैं. मेरे फ़ोन को उन्होंने सीरियसली नहीं लिया. कहा, “मज़ाक कर रही हो, और कोई काम नहीं है? जानती हो कहां फोन लगाई हो?” मैंने तो अंदर लपटें देखी थीं. मेरा सर घूम रहा था. चिल्लाई, “डॉक्टर के पी सिंह की नतिनी बोल रहे हैं हम. घर में आग लगी है और आपको मज़ाक लग रहा है? भेजिए जल्दी किसी को नहीं तो ठीक नहीं होगा.”

दमकल की गाड़ी आने की वजह से सड़क पर जाम लग गया था. फोटो:Getty Images दमकल की गाड़ी आने की वजह से सड़क पर जाम लग गया था. फोटो:Getty Images

कैसे बोल पाई, मुझे याद नहीं, मैं गुस्से में थी. तब तक मामा दौड़ते हुए आए, मुझे भी ले गए. हम सब पड़ोसी के घर बैठे हुए थे, कि कहीं सिलिंडर फट न जाए. दमकल वाले आए. सब देखा-भाला. आग बुझाई. नानी को डॉक्टर के पास ले गए. पता नहीं किस ताकत ने बचाया उन्हें. पर हाथ और पैर थोड़े थोड़े जलने के अलावा कुछ नहीं हुआ उनको. मामी जी नई नई शादी करके हमारे घर आई थीं. उनकी हालत और खराब. उनके घर में मौतें हो चुकी थीं सिलिंडर फटने की वजह से. उस समय उनकी मानसिक हालत क्या रही होगी, मैं नहीं समझ सकती थी.

इस हादसे के बाद किचन में जाने से डर लगने लगा. आग कहीं भी दिखती थी, हालत खराब हो जाती थी. मामी जी से दूर से कह देती थी, कुछ भी करना होता था तो. एक दिन मामा ने डांट कर कहा, तुम डरती हो, और उनको कुछ हो गया तो?

इस एक बात ने दिमाग के परखचे उड़ा दिए. इस तरह तो मैंने सोचा ही नहीं था. मैंने धीरे धीरे माचिस जलानी शुरू की. जला जला बुझा देती. गैस के पास जाती, लाइटर ऑन करके गैस जला भाग जाती. फिर मामी जी उस पर खाना बनातीं. सिलिंडर को अगर चूहा भी हिला देता था तो वहीं मौत दिखाई देने लग जाती थी. इस डर को जाने में बरसों लग गए. पर आखिर चला ही गया. अब आग से डर नहीं लगता. सिलिंडर से डर नहीं लगता. कई बार पाइप लीक हुआ, चूल्हा आग में डूबा, संभाल लिया. (इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी. पहले पाइप वगैरह इतने बढ़िया नहीं आते थे, और चूल्हा पुराना हो चला था.)

पानी के अपने डर की वजह से मैंने कभी कदम नहीं रखा किसी पूल में. समंदर में भी किनारे किनारे पैर डुबो लेती थी बस. एक दिन पड़े पड़े सोच रही थी, जो डर हम आँखों देखे सीखते हैं, वो हमें छोड़कर चले जाते हैं. जो डर कभी आँखों नहीं देखा, उससे क्या डरना. पहले पता तो चले वो डर है भी या नहीं.

कुछ रीसर्च कर रही थी इन्टरनेट पर. एक लिंक खोला तो दहल गई. चाइना के एक फोटोग्राफर ने गंगा में बहती लाशों की फोटो खींची थी. वो लाशें जो अधजली रह जाती हैं. वो लाशें जिनको केले के ताने पर बाँध बहा दिया जाता है. वो लाशें जो उकडूं बंधी डूब-उतरा रही होती हैं. वो लाशें जिनको लाश नहीं बनना था, फिर भी समय का फेर उन्हें वहां फेंक गया था. वो देखकर नानी की बात याद आ गई, ‘गंगा तो मां है, डूबने थोड़ी देगी’. मैंने तय किया कि ऐसे तो नहीं डूबूँगी मैं.

गंगा की ये तस्वीरें दहलाने के लिए काफी हैं. फोटो: Getty Images गंगा की ये तस्वीरें दहलाने के लिए काफी हैं. फोटो: Getty Images

पहली बार पानी में उतरी तो वही सारे दिन याद आ गए जब डुबकी मारी थी. ट्रेनर ने सिखाया, पैर ऐसे मारो, हाथ ऐसे रखो. सांस ऐसे लो, ऐसे छोड़ो. सबसे ज़रूरी जो बात बताई वो ये बताई कि जितना रेसिस्ट करोगे, जितना खुद को सख्त कर लोगे, उतनी जल्दी डूब जाओगे.

पानी को तुममें कोई इंटरेस्ट नहीं है. वो अपने आप में पूर्ण है. अगर तुम घुल नहीं सकते, तो उसके किसी काम के नहीं हो. वो तुम्हें चुभला कर थूक देगा वापस. जान ही घुलनशील होती है शायद.

पानी को तुम्हारी ज़रुरत नहीं है. उसके हिसाब से एडजस्ट होना तुम्हारी ज़रुरत है. फोटो: पिक्साबेपानी को तुम्हारी ज़रुरत नहीं है. उसके हिसाब से एडजस्ट होना तुम्हारी ज़रुरत है. फोटो: पिक्साबे

पानी से डर लग रहा था, इसलिए तैरना सीख रही हूँ. धीरे धीरे आ गया है आगे बढ़ना. पानी में भी, और डर से आगे भी. एक बड़ा पॉपुलर स्लोगन है- डर के आगे जीत है. मुझे जीत हार में कोई इंटरेस्ट नहीं है. इसमें डर के आगे किनारा है. वो किनारा जहाँ पहुँच कर मैं उस डर को पानी में छोड़ दूँगी. वो उसे अपने आप में घोल लेगा. मेरे सिर पे पड़ने वाला भंवर मिटेगा नहीं, इतना मुझे पता है. पर उसे उतार अपनी ऊँगली पर नचा लेने की हिम्मत रख सकना ही विराट स्वरुप हो जाना है.

प्रहलाद ने हिरण्यकशिपु को कहा था, ‘हममें तुममें खड्ग खंभ में, सबमें व्यापत राम’.

कभी कभी डर में हार या जीत नहीं होती, स्वीकृति और उससे आगे बढ़ जाना होता है, बस. फोटो: पिक्साबे कभी कभी डर में हार या जीत नहीं होती, स्वीकृति और उससे आगे बढ़ जाना होता है, बस. फोटो: पिक्साबे

जब वहां भगवान हो सकता है, तो कौन कहता है इंसान भगवान नहीं हो सकता. उसकी एक ही कमी है, कि वो अहम् के आगे स्वयं को भूल जाता है. जबकि भूलना कहीं और है. उस भूल सकने वाली जगह पहुंचना ही लक्ष्य है. मेरा तो है, बाकियों का पता नहीं.

इसका सेन्स समझना हो तो सेक्रेड गेम्स के गायतोंडे से समझ लीजिए: कभी कभी लगता है अपुन ही भगवान है

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