टोक्यो [प्रेट्र]। वैज्ञानिकों ने जीन के ऐसे जोड़े की खोज की है जिससे कि रात में लोगों को आने वाले बुरे सपनों को रोकने में मदद मिलेगी। रैपिड आइ मूवमेंट स्लीप, सोने की वह रहस्यमयी अवस्था है जिसमें जानवर स्वप्न देखते हैं। यह अवस्था उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक है। लेकिन, इसके पीछे जो मैकेनिज्म है उसकी जानकारी अभी नहीं है।

जापान के रीकेन सेंटर फॉर बायोसिस्टम्स डायनमिक्स रिसर्च के शोधकर्ताओं की टीम ने जीन के ऐसे जोड़े की पहचान की है जो यह तय करने में मदद करता है कि जानवर कितनी रैपिड आइ मूवमेंट और कितनी नॉन रैपिड आइ मूवमेंट नींद लेते हैं। रैपिड आइ मूवमेंट स्लीप के समय हमारा दिमाग उतना ही सक्रिय होता है जितना जाग्रत अवस्था में और यह यादाश्त का एकीकरण करने वाली अवस्था कही जाती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि रैपिड आइ मूवमेंट स्लीप को प्रभावित करने वाले कारकों की अभी कोई जानकारी नहीं है। सेल रिपोट्र्स में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि जब ये जीन एक्टिव होते हैं तो रैपिड आइ मूवमेंट स्लीप में एकदम कमी देखी गई। पूर्व में किए अध्ययन भी बताते हैं कि एसीटिलकोलीन पहला पहचाना गया न्यूरोट्रांसमीटर है और इसे ग्रहण करने वाला रैपिड आइ मूवमेंट स्लीप को कम या ज्यादा करने में महत्वपूर्ण रोल निभाता है।

एसीटिलकोलीन का स्राव स्तनधारियों कि दिमाग में रैपिड आइ मूवमेंट स्लीप के दौरान और जाग्रत अवस्था में होता है। हालांकि तंत्रिका तंत्र की जटिलता के कारण यह ज्ञात नहीं हो पाया कि कौन सा ग्राहक रैपिड आइ मूवमेंट स्लीप को नियमित करने में सहायक है। इसकी पहचान के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों पर प्रयोग किए और दो ग्राहक सीएचआरएम1 और सीएचआरएम3 की खोज की। शोधकर्ताओं का कहना है कि यही दो ग्राहक हैं जो रैपिड आइ मूवमेंट स्लीप के नियमन में सहायक होते हैं।