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UP में भी ‘हाथी’ नहीं आया ‘हाथ’ तो धरी रह जाएगी कांग्रेस की वापसी की आस

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मायावती ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से गठबंधन करने से साफ इनकार कर दिया है. मायावती इस तरह का रुख यूपी में अख्तियार करती हैं तो फिर कांग्रेस की वापसी की सारी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा.

अगले साल यानी 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में बसपा से हाथ मिलाकर बीजेपी को मात देने का सपना संजो रही थीं, लेकिन मायावती ने एक झटके में राहुल गांधी के अरमानों पर पानी फेर दिया है.

बसपा अध्यक्ष ने बुधवार को साफ कहा कि तीनों राज्यों में कांग्रेस के साथ उनकी पार्टी गठबंधन नहीं करेगी. मायावती इसी तरह का रवैया अगर यूपी में भी अख्तियार करती हैं तो कांग्रेस के लिए सूबे में अपने वजूद को बचाए रखना मुश्किल साबित हो सकता है.

केंद्र की सत्ता हासिल करने में यूपी की अहमियत सबसे ज्यादा है. प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं. यानी केंद्र में सरकार बनाने के लिए जितनी सीटें चाहिए, उसकी करीब एक तिहाई.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी गठबंधन ने 73 सीटें जीती थीं, तभी उसका मिशन 272 प्लस कामयाब हो पाया था. जबकि बसपा का खाता भी नहीं खुला था. वहीं, कांग्रेस रायबरेली और अमेठी तक सीमित हो गई थी और सपा को सिर्फ अपने परिवार की पांच सीटें जीत सकी थी. हालांकि ये नतीजे तब हैं जब सपा, बसपा और कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ अलग-अलग मैदान में थे.

मोदी की राह रोकने की कोशिश

2019 में बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी का रास्ता रोकने के लिए बसपा, सपा, आरएलडी और कांग्रेस के नेता साथ आने की बात कर रहे थे. लेकिन मायावती ने तीन राज्यों में कांग्रेस के साथ न आने का फैसला लेकर महागठबंधन की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है. इसे विपक्षी एकता के दावों की भी हवा निकल गई है.  ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी में भी कांग्रेस के साथ बसपा रहेगी, इस पर भी आशंका के बादल हैं.

बसपा 2019 के चुनाव में यूपी में अलग होकर लड़ती है तो कांग्रेस को बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है. इसे हम यूपी के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के नतीजों से हम इस बात को समझ सकते हैं. इन दोनों सीटों पर सपा को बसपा का समर्थन था, लेकिन कांग्रेस अकेले दम पर चुनावी मैदान में थी.

कांग्रेस को अकेले लड़ना महंगा पड़ा था

कांग्रेस को गोरखपुर और फूलपुर सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का खामियाजा भुगतना पड़ा था. कांग्रेस ने गोरखुपर में सुरहिता करीम मैदान में उतारा था, जंहा उनकी जमानत भी जब्‍त हो गई और उन्‍हें सिर्फ 18 हजार 844 वोट मिले थे. फूलपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने मनीष मिश्र को मैदान में उतारा था, जिन्हें महज 19 हजार 353 मत मिले थे. जबकि बसपा के समर्थन से सपा ने गोरखपुर और फूलपुर दोनों सीट पर जीतने में कामयाब रही थी.

दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस सूबे में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. मौजूदा समय में कांग्रेस के पास यूपी में दो संसदीय सीट और 7 विधायक हैं. ये नतीजा तब था जब लोकसभा चुनाव में अमेठी और रायबरेली में सपा ने अपने उम्मीदवारों को कांग्रेस के खिलाफ उतारा नहीं था. इसके अलावा विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके मैदान में उतरी थी.

वोटों का समीकरण

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले दम पर 71 सीटों के साथ 42.63 फीसदी वोट हासिल किए थे. जबकि सपा को 22.35 फीसदी वोटों के साथ महज 5 सीटें जीती थी. बसपा को 19.7 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. वहीं, कांग्रेस 7.53 फीसदी के साथ 2 सीटें ही जीत सकी थी.

ऐसे ही नतीजा 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो बीजेपी ने 39.7 फीसदी वोटों के साथ 312 सीटें जीतने में कामयाब रही. जबकि बसपा 22.2 फीसदी वोटों के साथ 19 सीटें, सपा 22 फीसदी वोटों के साथ 47 और कांग्रेस 6.2 फीसदी वोट के साथ 7 सीटें जीती थी.

कांग्रेस को अपने वजूद बचाने का खतरा

बसपा अध्यक्ष मायावती के तेवर को देखकर लगता है कि वो कांग्रेस के साथ किसी भी सूरत में गठबंधन करने के मूड में नजर नहीं आ रही है. अगर ऐसा होता है तो फिर कांग्रेस को अकेले मैदान में उतरना पड़ सकता है. इस स्थिति में कांग्रेस को प्रदेश में अपने वजूद को कायम रख पाना एक बड़ी चुनौती होगी.

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