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राजस्थान चुनावी अखाड़े में मुद्दे पीछे छोड़, संत और फकीर के बीच हो रही चुनावी लड़ाई

सुरेंद्र कुमार

पोखरन
पाकिस्तान बॉर्डर से 200 किलोमीटर दूर राजस्थान के पोखरण में इन दिनों चुनावी गहमागहमी बढ़ गई है। यह वही इलाका है, जहां भारत ने न्यूक्लियर टेस्ट किया था। यहां पर एक रेडियोधर्मी चुनावी लड़ाई हो रही है। रेगिस्तान के लगभग सबसे आखिरी छोर पर बनी इस विधानसभा में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी 26 नवंबर को आ सकते हैं। राहुल गांधी यहां चुनाव प्रचार करके कांग्रेस प्रत्याशी के लिए वोट मांगेंगे।यहां पर संत और फकीर के बीच मुकाबला हो रहा है। बीजेपी ने संत महंत प्रताप पुरी को यहां से टिकट दिया है जबकि कांग्रेस ने मुस्लिम धार्मिक नेता गाजी फकीर के बेटे सलेह मोहम्मद को उम्मीदवार बनाया है। सलेह मोहम्मद कांग्रेस के टिकट पर 2008 में यहां से चुनाव जीते थे हालांकि वह 2013 के चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार शैतान सिंह से चुनाव हार गए थे। 

इलाके में गाजी फकर का काफी प्रभाव
यह इलाका सिंधी मुस्लिम बाहुल्य है और सलेह मोहम्मद के पिता गाजी फकर का यहां काफी प्रभाव है। एक धार्मिक लीडर होने के नाते, फकीर का अपने समुदाय पर पूरा नियंत्रण है यहां तक की सीमा के दूसरी तरफ भी उनका निंयत्रण काम करता है।

सलेह मोहम्मद ने कहा, ‘बीजेपी पोखरण में सांप्रदायिक फूट पैदा करने का प्रयास कर रही है लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे। यहां पर हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच प्रेम और सद्भावना है का रिश्ता है और हम दोनों के समर्थन से चुनाव जीतेंगे।’

हिंदुत्व अजेंडा को लेकर पहचान
महंत प्रताप पुरी बाड़मेर के तारतारा संप्रदाय के मुख्य पुजारी हैं। उनके बाड़मेर और जैसलमेर इलाके में बहुत अनुयायी हैं। राजपूत परिवार से आने वाले महंत प्रताप पुरी का राजपूत वोटर्स पर भी अच्छी पकड़ है। यह फायरब्रांड साधु खुद को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह मानते हैं। वह यहां के लोगों के बीच हिंदुत्व अजेंडा को लेकर जाने जाते हैं।

वह कहते हैं, ‘कांग्रेस इस चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास कर रही है लेकिन मैं यहां लोगों को एक करने के लिए मौजूद हूं। मैं लोगों के कल्याण के लिए हमेशा काम करता रहा हूं और करता रहूंगा।’ 

क्या कहते हैं सियासी पंडित
राजनीतिक विशेषज्ञ रमेश विजय ने कहा, ‘विकास का मुद्दा, पीने के पानी की समस्या और प्रदेश की संरचना के पब्लिक से संबंधित सारे मुद्दे पीछे हो गए हैं। अब इस मुद्दों को कोई नहीं उठा रहा है। यहां के लोग अब इस चुनावी लड़ाई को संत और फकीर के बीच की बता रहे हैं। संभव है कि यहां के लोग अब सांप्रदायिक आधार पर वोट देंगे।’

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